भगवान विष्णु शेषनाग पर ही क्यों करते हैं शयन? जानिए क्षीरसागर, योगनिद्रा और शेषनाग का आध्यात्मिक रहस्य

By Tami

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धर्म संवाद / डेस्क : सनातन धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य बताया गया है। भगवान विष्णु को अक्सर क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा की अवस्था में विराजमान दिखाया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान विष्णु शेषनाग पर ही क्यों विश्राम करते हैं और इसका आध्यात्मिक अर्थ क्या है? आइए जानते हैं इस दिव्य स्वरूप के पीछे छिपे धार्मिक रहस्य।

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क्या है क्षीरसागर का आध्यात्मिक अर्थ?

‘क्षीर’ का अर्थ होता है दूध, जिसे सनातन परंपरा में पवित्रता, सात्विकता और निर्मलता का प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु का क्षीरसागर में निवास इस बात का संकेत है कि ईश्वर वहीं वास करते हैं जहां मन पूरी तरह शुद्ध, शांत और निष्कलंक हो। यह संदेश भी मिलता है कि यदि व्यक्ति का हृदय दूध की तरह निर्मल और सात्विक होगा, तो उसमें भगवान का निवास अवश्य होगा।

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शेषनाग पर शयन करने का क्या है रहस्य?

‘शेष’ का अर्थ है जो अंत में भी शेष रह जाए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब सृष्टि का प्रलय होता है और समस्त संसार समाप्त हो जाता है, तब भी शेषनाग विद्यमान रहते हैं। इसलिए शेषनाग को अनंत काल और समय का प्रतीक माना गया है। भगवान विष्णु का शेषनाग पर शयन करना यह दर्शाता है कि परमात्मा समय, काल और सृष्टि के सभी परिवर्तनों से परे हैं। वे अनादि और अनंत हैं।

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योगनिद्रा का क्या है महत्व?

क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर भगवान विष्णु की विश्राम मुद्रा को योगनिद्रा कहा जाता है। यह सामान्य नींद नहीं, बल्कि गहन ध्यान और आध्यात्मिक चेतना की अवस्था मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस अवस्था में भगवान विष्णु संपूर्ण ब्रह्मांड के संचालन, संरक्षण और संतुलन का चिंतन करते हैं। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, संतुलन और आत्मसंयम बनाए रखना चाहिए।

क्या संदेश देता है भगवान विष्णु का यह स्वरूप?

भगवान विष्णु का शेषनाग पर विराजमान होना कई आध्यात्मिक संदेश देता है।

  • जीवन में कितनी भी कठिनाइयां आएं, धैर्य और संयम नहीं छोड़ना चाहिए।
  • इच्छाओं, क्रोध और मोह-माया पर नियंत्रण रखना ही सच्ची साधना है।
  • शांत और सात्विक मन में ही ईश्वर का वास होता है।
  • समय और परिस्थितियों से ऊपर उठकर धर्म और कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

शास्त्रों में मिलता है उल्लेख

भगवान विष्णु के इस दिव्य स्वरूप का विस्तृत वर्णन विष्णु पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। शास्त्रों के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति से पहले भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में लीन रहते हैं। इसी अवस्था से सृष्टि के सृजन, पालन और संचालन की दिव्य प्रक्रिया प्रारंभ होती है।

नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पुराणों और पारंपरिक विश्वासों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक एवं सांस्कृतिक जानकारी प्रदान करना है।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .