धर्म संवाद / डेस्क : हिंदू धर्म में मां दुर्गा को शक्ति, साहस और संकटों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। भक्त अलग-अलग स्तोत्रों और मंत्रों के माध्यम से माता की आराधना करते हैं। इन्हीं में एक विशेष स्तोत्र है श्री दुर्गा आपदुद्धार स्तोत्रम्। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ इसका पाठ करने से मन में साहस, विश्वास और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।
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‘आपदुद्धार’ शब्द का अर्थ है आपदाओं या संकटों से उद्धार करना। इस स्तोत्र में मां दुर्गा को जगततारिणी यानी संसार को तारने वाली और संकटों से उबारने वाली देवी के रूप में नमन किया गया है।
परंपरागत रूप से इस स्तोत्र को सिद्धेश्वरी तंत्र के उमा-महेश्वर संवाद से संबंधित बताया जाता है। इसमें भगवान शिव मां पार्वती को देवी दुर्गा की स्तुति का उपदेश देते हैं। आइए जानते हैं इस स्तोत्र का धार्मिक महत्व, पाठ की विधि और इसका संपूर्ण संस्कृत पाठ।
श्री दुर्गा आपदुद्धार स्तोत्रम् का धार्मिक महत्व
दुर्गा आपदुद्धार स्तोत्र में मां भगवती के करुणामयी, शक्तिशाली और रक्षक स्वरूप की स्तुति की गई है। इसमें देवी को अनाथ, दुखी, भयभीत और संकट में पड़े लोगों का एकमात्र सहारा बताया गया है। इस स्तोत्र में जंगल, युद्ध, शत्रुओं, अग्नि, समुद्र और अन्य कठिन परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है। भक्त इन पंक्तियों के माध्यम से मां दुर्गा से हर प्रकार के संकट में रक्षा और मार्गदर्शन की प्रार्थना करते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, नियमित रूप से इसका पाठ करने से व्यक्ति के मन में भय कम करने, आत्मविश्वास बढ़ाने और कठिन समय में धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है।
श्री दुर्गा आपदुद्धार स्तोत्रम् का संपूर्ण पाठ
नीचे प्रचलित पाठ के अनुसार स्तोत्र के श्लोक दिए गए हैं। अलग-अलग पुस्तकों और परंपराओं में कुछ शब्दों के पाठांतर मिल सकते हैं।
॥ श्री दुर्गा आपदुद्धार स्तोत्रम् ॥
॥ प्रथम श्लोक ॥
नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे,
नमस्ते जगद्व्यापिके विश्वरूपे।
नमस्ते जगद्वन्द्यपादारविन्दे,
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥ १॥
॥ द्वितीय श्लोक ॥
नमस्ते जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे,
नमस्ते महायोगिनि ज्ञानरूपे।
नमस्ते नमस्ते सदानन्दरूपे,
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥ २॥
॥ तृतीय श्लोक ॥
अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य,
भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री,
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥ ३॥
॥ चतुर्थ श्लोक ॥
अरण्ये रणे दारुणे शत्रुमध्ये,
ऽनले सागरे प्रान्तरे राजगेहे।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारनौका,
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥ ४॥
॥ पंचम श्लोक ॥
अपारे महादुस्तरेऽत्यन्तघोरे,
विपत्सागरे मज्जतां देहभाजाम्।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारहेतुर्नमस्ते,
जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥ ५॥
॥ षष्ठ श्लोक ॥
नमश्चण्डिके चण्डदुर्दण्डलीला,
समुत्खण्डिताखण्डिताशेषशत्रोः।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारबीजं,
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥ ६॥
॥ सप्तम श्लोक ॥
त्वमेका सदाराधिता सत्यवादिन्यनेकाखिला,
क्रोधनात्क्रोधनिष्ठा।
इडा पिङ्गला त्वं सुषुम्ना च नाडी,
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥ ७॥
॥ अष्टम श्लोक ॥
नमो देवि दुर्गे शिवे भीमनादे,
सदासर्वसिद्धिप्रदातृस्वरूपे।
विभूतिः शची कालरात्रिः सती त्वं,
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥ ८॥
॥ नवम श्लोक ॥
शरणमसि सुराणां सिद्धविद्याधराणां,
मुनिमनुजपशूनां दस्युभिस्त्रासितानाम्।
नृपतिगृहगतानां व्याधिभिः पीडितानां,
त्वमसि शरणमेका देवि दुर्गे प्रसीद॥ ९॥
॥ फलश्रुति ॥
इदं स्तोत्रं मया प्रोक्तमापदुद्धारहेतुकम्।
त्रिसन्ध्यमेकसन्ध्यं वा पठनाद्घोरसङ्कटात्॥ १०॥
मुच्यते नात्र सन्देहो भुवि स्वर्गे रसातले।
सर्वं वा श्लोकमेकं वा यः पठेद्भक्तिमान्सदा॥ ११॥
स सर्वं दुष्कृतं त्यक्त्वा प्राप्नोति परमं पदम्।
पठनादस्य देवेशि किं न सिद्ध्यति भूतले।
स्तवराजमिदं देवि सङ्क्षेपात्कथितं मया॥ १२॥
॥ इति श्रीसिद्धेश्वरीतन्त्रे उमामहेश्वरसंवादे श्री दुर्गा आपदुद्धार स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
दुर्गा आपदुद्धार स्तोत्र का पाठ कैसे करें?
मां दुर्गा के इस स्तोत्र का पाठ श्रद्धा और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। इसके लिए किसी विशेष कठिन नियम की अनिवार्यता नहीं है। आप अपनी सुविधा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार पाठ कर सकते हैं।
- सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- पूजा स्थान पर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने बैठें।
- माता के समक्ष दीपक और धूप जलाएं।
- मन को शांत करके मां दुर्गा का ध्यान करें।
- इसके बाद पूरे स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
- अंत में माता से परिवार की सुख-शांति और संकटों में सही मार्ग दिखाने की प्रार्थना करें।
दुर्गा आपदुद्धार स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
स्तोत्र की फलश्रुति में त्रिसंध्या यानी दिन की तीन संध्याओं में अथवा एक संध्या में पाठ करने का उल्लेख मिलता है। इसका अर्थ है कि भक्त अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार सुबह, दोपहर या शाम में पाठ कर सकते हैं। नवरात्रि, दुर्गा अष्टमी और अन्य देवी उपासना के अवसरों पर भी भक्त इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। हालांकि, इसके पाठ के लिए किसी विशेष पर्व का इंतजार करना जरूरी नहीं माना जाता।
दुर्गा आपदुद्धार स्तोत्र के पाठ से जुड़े धार्मिक लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा के इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त को कई आध्यात्मिक लाभ मिल सकते हैं।
- संकटों में साहस: मां दुर्गा से प्रार्थना करने से कठिन परिस्थितियों का सामना करने का आत्मविश्वास मिलता है।
- भय से मुक्ति की प्रार्थना: स्तोत्र में देवी को भयभीत और दुखी लोगों का सहारा बताया गया है।
- मानसिक शांति: नियमित स्तुति और ध्यान से मन को एकाग्र करने में मदद मिल सकती है।
- आत्मविश्वास में वृद्धि: देवी के शक्तिशाली स्वरूप का स्मरण व्यक्ति को सकारात्मक रहने की प्रेरणा देता है।
- भक्ति और समर्पण: इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
ध्यान रखें कि ये लाभ धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। स्तोत्र का पाठ किसी चिकित्सा, कानूनी या अन्य आवश्यक व्यावहारिक सहायता का विकल्प नहीं है।






