धर्म संवाद / डेस्क : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन शनिवार को अपनी पत्नी कल्पना सोरेन के साथ रांची-टाटा मार्ग पर तमाड़ स्थित प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मां Dewri मंदिर पहुंचे। मुख्यमंत्री ने विधि-विधान के साथ मां Dewri की पूजा-अर्चना कर राज्य की सुख-शांति, समृद्धि और जनता के कल्याण की कामना की।
मां Dewri मंदिर झारखंड की आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। यही वजह है कि राज्य ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यह मंदिर आदिवासी और सनातन परंपराओं के अद्भुत संगम का प्रतीक माना जाता है।
MS Dhoni की गहरी आस्था जुड़ी है इस मंदिर से
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का भी मां Dewri मंदिर से विशेष लगाव रहा है। माना जाता है कि जब भी धोनी रांची आते हैं, वह मां Dewri के दरबार में माथा टेकने जरूर पहुंचते हैं। क्रिकेट करियर के दौरान किसी बड़ी सीरीज या टूर्नामेंट से पहले भी वह यहां आशीर्वाद लेने आते थे।
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साल 2011 में भारत को क्रिकेट विश्व कप जिताने से पहले भी धोनी ने मां Dewri का आशीर्वाद लिया था। विश्व कप जीतकर रांची लौटने के बाद उन्होंने सबसे पहले मंदिर पहुंचकर मां के चरणों में शीश नवाया था। यही कारण है कि यह मंदिर धोनी के प्रशंसकों के बीच भी काफी लोकप्रिय है।
16 भुजाओं वाली मां की अनोखी प्रतिमा
मां Dewri मंदिर में स्थापित देवी काली की प्रतिमा करीब साढ़े तीन फीट ऊंची है। देवी की यह मूर्ति 16 भुजाओं वाली है, जो इसे अन्य शक्तिपीठों से अलग बनाती है। बताया जाता है कि इस प्रतिमा की शिल्पकला पर ओडिशा की पारंपरिक मूर्तिकला का प्रभाव दिखाई देता है।
700 साल पुराना इतिहास
मंदिर के इतिहास को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं। माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना लगभग 1300 ईस्वी के आसपास सिंहभूम के मुंडा राजा केरा ने कराई थी। लोककथाओं के अनुसार युद्ध में पराजित होकर लौट रहे राजा केरा को देवी ने स्वप्न में दर्शन दिए और मंदिर निर्माण का आदेश दिया। राजा ने मंदिर का निर्माण कराया, जिसके बाद उन्हें अपना खोया हुआ राज्य और सिंहासन पुनः प्राप्त हो गया। इसी कारण यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है।
मंदिर से जुड़ी रहस्यमयी कहानी
स्थानीय लोगों के बीच एक और कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक भक्त को सपने में इस मंदिर के बारे में संकेत मिला था। अगले दिन उसने घने जंगलों में मंदिर की खोज शुरू की और काफी प्रयास के बाद उसे यह प्राचीन मंदिर दिखाई दिया। इसके बाद आसपास के ग्रामीणों को मंदिर की जानकारी मिली और यहां पूजा-अर्चना शुरू हुई।
आदिवासी और सनातन परंपरा का संगम
मां Dewri मंदिर की सबसे खास बात इसकी पूजा पद्धति है। यहां सप्ताह में छह दिन पूजा आदिवासी पाहन (पुजारी) करते हैं, जबकि एक दिन ब्राह्मण द्वारा पूजा-अर्चना की जाती है। यह व्यवस्था आदिवासी और सनातन संस्कृति के अनूठे समन्वय को दर्शाती है।
कैसे पहुंचे मां Dewri मंदिर?
मां Dewri मंदिर रांची शहर से लगभग 60 किलोमीटर दूर तमाड़ प्रखंड में स्थित है। रांची से यहां के लिए नियमित बस और अन्य यातायात सुविधाएं उपलब्ध हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरते समय ओवरब्रिज पर पहुंचते ही मंदिर का भव्य गुंबद दिखाई देने लगता है।
क्यों खास है मां Dewri मंदिर?
- 16 भुजाओं वाली मां काली की दुर्लभ प्रतिमा
- करीब 700 साल पुराना ऐतिहासिक मंदिर
- MS Dhoni की गहरी आस्था से जुड़ा स्थान
- आदिवासी और सनातन परंपराओं का संगम
- झारखंड के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में शामिल
आज मां Dewri मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत, इतिहास और आस्था का प्रतीक बन चुका है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना अवश्य पूरी होती है।






