धर्म संवाद / डेस्क : जैन धर्म में पर्युषण पर्व का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इसे जैन धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक माना जाता है। वर्ष 2026 में पर्युषण पर्व 8 सितंबर से शुरू हो रहा है। यह पर्व केवल उपवास और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, अहिंसा, क्षमा और आत्मशुद्धि का संदेश देता है।
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जैन दर्शन के अनुसार सच्चा धार्मिक जीवन वही है, जिसमें अहंकार कम हो, विनम्रता बढ़े और सभी जीवों के प्रति दया की भावना विकसित हो। पर्युषण पर्व इसी भावना को जीवन में उतारने का अवसर देता है।
पर्युषण पर्व का क्या अर्थ है?
‘पर्युषण’ का भावार्थ है अपनी आत्मा के करीब रहना। इस दौरान व्यक्ति बाहरी और सांसारिक गतिविधियों से अपना ध्यान हटाकर धर्म, साधना और आत्मचिंतन की ओर केंद्रित करता है। इस पर्व में जैन अनुयायी अपने दैनिक जीवन में संयम बढ़ाने और अहिंसा, सत्य, तप, त्याग तथा आत्म-नियंत्रण जैसे सिद्धांतों का पालन करने का प्रयास करते हैं। पर्युषण का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग करना नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि करना भी है।
पर्युषण पर्व कितने दिनों तक मनाया जाता है?
जैन धर्म की अलग-अलग परंपराओं में इस पर्व की अवधि अलग होती है।
- श्वेतांबर जैन परंपरा: पर्युषण पर्व 8 दिनों तक मनाया जाता है।
- दिगंबर जैन परंपरा: इसी अवधि के आसपास दशलक्षण पर्व 10 दिनों तक मनाया जाता है।
वर्ष 2026 में श्वेतांबर परंपरा के अनुसार पर्युषण पर्व 8 सितंबर से शुरू हो रहा है।
पर्युषण पर्व के दौरान क्या किया जाता है?
पर्युषण के दौरान श्रद्धालु अपनी क्षमता और संकल्प के अनुसार विभिन्न धार्मिक गतिविधियों में शामिल होते हैं। इनमें प्रमुख हैं:
- उपवास और एकासन करना
- आयंबिल जैसी तपस्या करना
- सामायिक और प्रतिक्रमण करना
- धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना
- साधु-संतों के प्रवचन सुनना
- ध्यान और आत्मचिंतन करना
- अहिंसा और संयम का पालन करना
- क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह पर नियंत्रण का प्रयास करना
कई श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखते हैं, जबकि कुछ लोग दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं। तपस्या का स्वरूप व्यक्ति की क्षमता और संकल्प के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
पर्युषण पर्व में आत्मचिंतन का महत्व
पर्युषण पर्व का सबसे महत्वपूर्ण संदेश अपने भीतर झांकना है। इस दौरान व्यक्ति अपने व्यवहार, विचारों और कर्मों का आत्ममंथन करता है। जैन दर्शन में माना जाता है कि क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी भावनाएं आत्मिक प्रगति में बाधा बनती हैं। इसलिए पर्युषण के दौरान इन भावनाओं पर नियंत्रण पाने और मन को अधिक शांत एवं संयमित बनाने का प्रयास किया जाता है।
संवत्सरी क्या है और इसका क्या महत्व है?
श्वेतांबर जैन परंपरा में पर्युषण पर्व के अंतिम दिन संवत्सरी मनाई जाती है। इसे आत्मचिंतन और क्षमायाचना का महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस दिन जैन धर्मावलंबी वर्षभर में हुई अपनी गलतियों और भूलों पर विचार करते हैं। जानबूझकर या अनजाने में किसी को दुख पहुंचाने के लिए क्षमा मांगी जाती है और दूसरों को भी क्षमा किया जाता है।
इसी अवसर पर ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ कहा जाता है। इसका भाव है कि यदि विचार, वचन या कर्म से जानबूझकर अथवा अनजाने में कोई गलती हुई हो, तो उसके लिए क्षमा किया जाए।
पर्युषण पर्व के 8 दिनों में क्या होता है?
पहला दिन
पर्युषण की शुरुआत पूजा, सामायिक, धार्मिक साधना और तपस्या के संकल्प के साथ होती है।
दूसरा और तीसरा दिन
इन दिनों उपवास, एकासन, आयंबिल, स्वाध्याय और प्रतिक्रमण जैसी धार्मिक गतिविधियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
चौथा और पांचवां दिन
धार्मिक ग्रंथों और जैन धर्म की शिक्षाओं का अध्ययन किया जाता है। साथ ही आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना पर जोर रहता है।
छठा दिन
इस दिन संयम, त्याग और अहिंसा के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
सातवां दिन
कल्पसूत्र के पाठ का विशेष महत्व रहता है। श्वेतांबर परंपरा में भगवान महावीर के जीवन और जन्म से जुड़े प्रसंगों का विशेष रूप से स्मरण किया जाता है।
आठवां दिन
पर्युषण पर्व के अंतिम दिन संवत्सरी मनाई जाती है। इस दिन प्रतिक्रमण, आत्मचिंतन और क्षमायाचना की जाती है। लोग एक-दूसरे से क्षमा मांगते हुए ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ कहते हैं।
पर्युषण पर्व का मुख्य संदेश क्या है?
पर्युषण पर्व हमें बाहरी सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देता है। यह पर्व बताता है कि धार्मिक जीवन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि अहिंसा, संयम, त्याग, क्षमा, विनम्रता और आत्मशुद्धि को व्यवहार में उतारना भी उतना ही जरूरी है।
इस पर्व का मूल संदेश है कि व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह को कम करे और सभी जीवों के प्रति करुणा एवं सम्मान की भावना रखे।
