धर्म संवाद / डेस्क : दीपावली का त्योहार आते ही देशभर के मंदिरों में भक्ति और उत्सव का माहौल देखने को मिलता है। धनतेरस से शुरू होने वाला पांच दिवसीय दीपोत्सव भाई दूज तक चलता है। इस दौरान मां लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि दीपावली पर माता लक्ष्मी की आराधना करने से घर में सुख-समृद्धि, धन-वैभव और खुशहाली आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दक्षिण भारत में एक ऐसा दिव्य मंदिर भी है, जहां माता लक्ष्मी के अवतार के रूप में देवी पद्मावती की पूजा की जाती है?
आंध्र प्रदेश के तिरुचनूर में स्थित श्री पद्मावती अम्मावारी मंदिर दीपावली के अवसर पर विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है। भगवान वेंकटेश्वर (बालाजी) की पत्नी देवी पद्मावती को समर्पित यह मंदिर अपनी भव्यता, धार्मिक मान्यताओं और विशेष पूजा परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। दीपावली के दौरान यहां हजारों दीपक जलाए जाते हैं और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है। आइए जानते हैं इस मंदिर का धार्मिक महत्व, दीपावली की खास परंपराएं और इससे जुड़ी पौराणिक कथा।
दीपावली पर खास हो जाती है तिरुचनूर मंदिर की रौनक
आंध्र प्रदेश के तिरुपति के पास स्थित तिरुचनूर का श्री पद्मावती अम्मावारी मंदिर माता लक्ष्मी के पद्मावती स्वरूप को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पद्मावती को देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। यही वजह है कि दीपावली के अवसर पर इस मंदिर में विशेष उत्सव का आयोजन किया जाता है।
दीपावली के दौरान मंदिर को फूलों, पारंपरिक सजावट और रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है। माता के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त माता पद्मावती से सुख-समृद्धि, धन-धान्य और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
दीपावली पर भगवान बालाजी भेजते हैं माता पद्मावती के लिए खास उपहार
श्री पद्मावती अम्मावारी मंदिर की दीपावली परंपराओं में सबसे खास भगवान वेंकटेश्वर की ओर से माता पद्मावती के लिए भेजी जाने वाली विशेष भेंट मानी जाती है। इसे ‘सारे’ कहा जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, तिरुमाला पहाड़ियों पर स्थित भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के मुख्य मंदिर से माता पद्मावती के लिए विशेष उपहार भेजा जाता है। इस भेंट में रेशमी वस्त्र यानी पट्टू साड़ी, आभूषण, हल्दी, कुमकुम और विशेष नैवेद्य शामिल होते हैं।
इस भेंट को पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ तिरुमाला से तिरुचनूर लाया जाता है और माता पद्मावती को समर्पित किया जाता है। यह परंपरा भगवान वेंकटेश्वर और माता पद्मावती के दिव्य वैवाहिक संबंध का प्रतीक मानी जाती है।
दीपावली आस्थानम में होती है विशेष पूजा-अर्चना
दीपावली के शुभ अवसर पर मंदिर में ‘दीपावली आस्थानम’ नामक विशेष धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है। इस दौरान मंदिर के पुजारी वैदिक मंत्रोच्चार के साथ माता पद्मावती की विशेष पूजा करते हैं। माता के गर्भगृह में विशेष धार्मिक विधियां संपन्न होती हैं। महा मंगल आरती और अन्य पारंपरिक अनुष्ठानों के माध्यम से देवी की आराधना की जाती है। इस अवसर पर मंदिर में भक्तों की भीड़ और भक्ति का विशेष वातावरण देखने को मिलता है।
हजारों दीपकों से जगमगा उठता है माता का दरबार
दीपावली का संबंध प्रकाश, सकारात्मकता और अंधकार पर प्रकाश की विजय से है। इसी भावना के साथ मंदिर परिसर में पारंपरिक दीपक जलाकर विशेष सजावट की जाती है। कार्तिक मास में दीपदान का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। ऐसे में मंदिर परिसर में तेल के दीये और रंग-बिरंगी रोशनी आकर्षण का केंद्र बनते हैं। शाम के समय दीपों की रोशनी से मंदिर का पूरा परिसर जगमगा उठता है।
धार्मिक परंपराओं में सहस्र दीपलंकरण सेवा का भी विशेष महत्व है। हजारों दीपकों के बीच देवी की आराधना का दृश्य भक्तों के लिए बेहद दिव्य और मनमोहक माना जाता है।
भगवान बालाजी के दर्शन से पहले क्यों जरूरी माने जाते हैं माता पद्मावती के दर्शन?
तिरुमाला में भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए तिरुचनूर स्थित माता पद्मावती के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान बालाजी के दर्शन से पहले माता पद्मावती के चरणों में शीश नवाना चाहिए।
इस परंपरा के पीछे ‘पुरुषकारम’ की अवधारणा जुड़ी हुई है। वैष्णव मान्यताओं के अनुसार, माता लक्ष्मी भक्तों और भगवान नारायण के बीच करुणामयी माध्यम हैं। माना जाता है कि माता अपने भक्तों की प्रार्थना भगवान तक पहुंचाती हैं और उन पर कृपा करने की प्रार्थना करती हैं। इसी वजह से श्रद्धालु पहले माता पद्मावती का आशीर्वाद लेते हैं और फिर भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन के लिए तिरुमाला जाते हैं।
क्या है माता पद्मावती के धरती पर जन्म की पौराणिक कथा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार महर्षि भृगु भगवान विष्णु से मिलने वैकुंठ पहुंचे। वहां उन्होंने भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर पैर से प्रहार कर दिया। भगवान विष्णु ने ऋषि के इस व्यवहार पर भी क्रोध नहीं किया और उनके पैर दबाने लगे। माना जाता है कि भगवान विष्णु के वक्षस्थल में माता लक्ष्मी का निवास है। ऐसे में माता लक्ष्मी को महर्षि भृगु का यह व्यवहार अपमानजनक लगा। भगवान विष्णु द्वारा ऋषि को दंड नहीं दिए जाने से नाराज होकर माता लक्ष्मी वैकुंठ छोड़कर पृथ्वी लोक पर चली आईं।
मान्यता के अनुसार, माता लक्ष्मी कोल्हापुर में तपस्या करने लगीं। वहीं, भगवान विष्णु भी माता की तलाश में पृथ्वी पर आए और शेषाचल पर्वत पर भगवान वेंकटेश्वर के रूप में निवास करने लगे।
राजा आकाशराज के यज्ञ से जुड़ा है माता पद्मावती का जन्म
इसी दौरान पृथ्वी पर नारायणवनम के राजा आकाशराज संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे। धार्मिक कथा के अनुसार, एक दिन राजा जब यज्ञ के लिए भूमि जोत रहे थे, तब उन्हें पद्म सरोवर में खिले सुनहरे कमल के फूल पर एक दिव्य कन्या दिखाई दी। राजा ने उस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। कमल के फूल से प्रकट होने के कारण उसका नाम पद्मावती रखा गया। मान्यता है कि यह दिव्य कन्या स्वयं माता लक्ष्मी का ही स्वरूप थीं।
भगवान वेंकटेश्वर और माता पद्मावती का हुआ दिव्य विवाह
समय बीतने के साथ माता पद्मावती बड़ी हुईं। एक दिन जंगल में उनकी मुलाकात भगवान वेंकटेश्वर से हुई। पौराणिक कथा के अनुसार, दोनों ने एक-दूसरे को पहचाना और उनके विवाह का प्रसंग आगे बढ़ा। भगवान वेंकटेश्वर ने राजा आकाशराज के सामने पद्मावती से विवाह का प्रस्ताव रखा। राजा ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और देवताओं की उपस्थिति में दोनों का भव्य विवाह संपन्न हुआ।
इस विवाह को भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के दिव्य मिलन के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि तिरुचनूर का पद्मावती मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।
दीपावली पर क्यों करें माता पद्मावती की पूजा?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पद्मावती की पूजा करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। दीपावली पर माता लक्ष्मी के इस स्वरूप की आराधना करना विशेष फलदायी माना जाता है। भक्त इस अवसर पर माता से परिवार की खुशहाली, आर्थिक उन्नति और जीवन में सकारात्मकता बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। हालांकि, पूजा का फल व्यक्ति की श्रद्धा और धार्मिक विश्वास से जुड़ा माना जाता है।
इस तरह तिरुचनूर का श्री पद्मावती अम्मावारी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के दिव्य मिलन की कथा से जुड़ा आस्था का प्रमुख केंद्र भी है। दीपावली के दौरान यहां होने वाले विशेष अनुष्ठान, दीप सजावट और पारंपरिक पूजा इस मंदिर की धार्मिक महत्ता को और बढ़ा देते हैं।






