धर्म संवाद / डेस्क : दिवाली का त्योहार नजदीक आते ही देशभर के मंदिरों में तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कहीं मां लक्ष्मी की विशेष पूजा होती है, तो कहीं दीपदान और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। लेकिन महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित प्रसिद्ध श्री महालक्ष्मी यानी अंबाबाई मंदिर में दीपावली के अवसर पर एक बेहद खास परंपरा निभाई जाती है। यहां मंदिर के शिखर पर दीप और मशाल जलाने की परंपरा श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है।
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां अंबाबाई के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है। यही वजह है कि दीपावली और कार्तिक मास के दौरान बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। आइए जानते हैं कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर की इस अनोखी परंपरा, इसके धार्मिक महत्व और दिवाली पर दर्शन से जुड़ी मान्यताओं के बारे में।
महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में शामिल है अंबाबाई मंदिर
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर को अंबाबाई मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह देश के प्रमुख शक्तिस्थलों में गिना जाता है और महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मंदिर में मां महालक्ष्मी की भव्य प्रतिमा विराजमान है।
यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि प्राचीन इतिहास और अद्भुत वास्तुकला के लिए भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना मां अंबाबाई अवश्य पूरी करती हैं। भक्तों के बीच यह विश्वास भी प्रचलित है कि तिरुपति बालाजी के दर्शन के बाद कोल्हापुर की महालक्ष्मी के दर्शन करना शुभ माना जाता है।
मंदिर का एक प्रमुख आकर्षण यहां होने वाला किरणोत्सव है। इस विशेष अवसर पर सूर्य की किरणें मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचकर मां अंबाबाई के चरणों को स्पर्श करती हैं। यह अद्भुत दृश्य श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।
दिवाली पर मंदिर के शिखर पर जलाया जाता है दीप और मशाल
कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली के अवसर पर मंदिर के शिखर पर दीप और मशाल जलाने की विशेष परंपरा निभाई जाती है। यह परंपरा कार्तिक मास के धार्मिक आयोजनों से भी जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार, नरक चतुर्दशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा यानी त्रिपुरारी पूर्णिमा तक मंदिर में विशेष दीपदान और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इस दौरान मंदिर के शिखर पर भी दीप प्रज्वलित किए जाते हैं।
कार्तिक मास में श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर पंचगंगा नदी में स्नान करते हैं। इसके बाद नदी और मंदिर में दीपदान कर मां महालक्ष्मी के दर्शन करते हैं। इस दौरान मंदिर में भक्तों की विशेष भीड़ देखने को मिलती है।
शिखर पर जलती मशाल का क्या है धार्मिक महत्व?
मंदिर के शिखर पर प्रज्वलित दीप और मशाल को केवल रोशनी का प्रतीक नहीं माना जाता, बल्कि इसके पीछे गहरी धार्मिक भावना जुड़ी हुई है। मान्यता है कि दीपक की रोशनी जीवन से अज्ञान, नकारात्मकता और परेशानियों के अंधकार को दूर करने का संदेश देती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां महालक्ष्मी की कृपा से उनके घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। कार्तिक मास में दीपदान को भी विशेष पुण्यदायी माना गया है। इसी वजह से इस पूरे महीने मंदिरों और पवित्र नदियों के किनारे दीप जलाने की परंपरा निभाई जाती है।
दिवाली पर सोने के आभूषणों से सजती हैं मां अंबाबाई
दीपावली के पावन अवसर पर मां अंबाबाई का विशेष शृंगार किया जाता है। इस दौरान माता को सुंदर और बहुमूल्य सोने के आभूषणों से सजाया जाता है। फूलों और दीपों से सजे मंदिर की भव्यता भक्तों का मन मोह लेती है।
धार्मिक मान्यता है कि दीपावली के शुभ अवसर पर मां महालक्ष्मी के दर्शन करने से घर में धन-धान्य और सुख-समृद्धि बनी रहती है। कई श्रद्धालु माता से कर्ज, आर्थिक परेशानियों और परिवार की समस्याओं से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।






