बिछिया दूसरी उंगली में ही क्यों पहनती हैं महिलाएं? चांदी और राहु-केतु से क्या है संबंध

By Tami

Published on:

Bichiya Rahu Ketu, Shukra Grah, Chandra Grah

धर्म संवाद / डेस्क : भारतीय संस्कृति में महिलाओं के सोलह श्रृंगार का विशेष महत्व बताया गया है। इन्हीं पारंपरिक आभूषणों में बिछिया भी शामिल है। शादी के बाद कई महिलाएं दोनों पैरों की दूसरी उंगली में चांदी की बिछिया पहनती हैं। यह केवल श्रृंगार का हिस्सा नहीं, बल्कि इससे जुड़ी कई धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं भी प्रचलित हैं।

यह भी पढ़े : तुलसी के पास भूलकर भी न रखें ये 5 चीजें, जानें क्या कहता है वास्तु

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बिछिया चांदी की ही क्यों होती है और इसे पैर की दूसरी उंगली में ही क्यों पहना जाता है? इसके पीछे चांदी, ग्रहों और शरीर के कुछ हिस्सों से जुड़ी पारंपरिक मान्यताएं बताई जाती हैं।

WhatsApp channel Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Join Now

चांदी की बिछिया ही क्यों पहनते हैं?

ज्योतिषीय मान्यताओं में चांदी का संबंध चंद्रमा और शुक्र ग्रह से जोड़ा जाता है। चंद्रमा को मन, भावनाओं और मानसिक शांति का कारक माना जाता है, जबकि शुक्र को प्रेम, सौंदर्य, सुख-सुविधा और वैवाहिक जीवन से संबंधित माना जाता है।

इसी वजह से पारंपरिक ज्योतिष में चांदी के आभूषण पहनने को सकारात्मक माना गया है। पैरों में चांदी पहनने की परंपरा को भी इसी धार्मिक और ज्योतिषीय विचार से जोड़ा जाता है। हालांकि ग्रहों और आभूषणों के बीच ऐसे संबंध ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं, वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं।

बिछिया का राहु-केतु से क्या संबंध है?

पारंपरिक ज्योतिष में शरीर के अलग-अलग हिस्सों को विभिन्न ग्रहों के प्रभाव से जोड़कर देखा जाता है। ज्योतिषीय मत में शरीर के निचले हिस्से और पैरों का संबंध केतु से बताया जाता है। वहीं राहु और केतु को छाया ग्रह माना जाता है और इनका संबंध भ्रम, मानसिक उलझन तथा जीवन में आने वाले अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव से जोड़ा जाता है।

कुछ ज्योतिषीय परंपराओं में माना जाता है कि चांदी की शीतल प्रकृति राहु-केतु से जुड़े नकारात्मक प्रभावों को शांत करने में सहायक हो सकती है। इसी वजह से पैरों में चांदी के आभूषण पहनने की परंपरा को ज्योतिष से जोड़ा जाता है।

दूसरी उंगली में ही क्यों पहनते हैं बिछिया?

बिछिया सामान्य तौर पर पैर के अंगूठे के ठीक बगल वाली दूसरी उंगली में पहनी जाती है। भारतीय परंपरा में इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ शरीर से जुड़े पारंपरिक विचार भी बताए जाते हैं।

See also  इस दिन भूलकर भी न करें पीपल के पेड़ की पूजा

कुछ एक्यूप्रेशर और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों से जुड़े विचारों में पैर की उंगलियों पर मौजूद कुछ बिंदुओं का संबंध शरीर के अलग-अलग हिस्सों से बताया जाता है। इसी आधार पर यह मान्यता प्रचलित है कि दूसरी उंगली में बिछिया पहनने से शरीर में संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि बिछिया पहनने से स्वास्थ्य लाभ होने के इन दावों को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में निर्णायक रूप से प्रमाणित नहीं माना जाता।

सोने की बिछिया क्यों नहीं पहनते?

भारतीय धार्मिक परंपरा में पैरों में सोना पहनने से परहेज किया जाता है। इसका संबंध धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं की मान्यताओं से जोड़ा जाता है। हिंदू परंपरा में सोने को पवित्र धातु माना जाता है और इसे भगवान विष्णु तथा देवी लक्ष्मी से संबंधित माना जाता है। इसी कारण शरीर के कमर से नीचे सोना धारण करना कई परिवारों और परंपराओं में उचित नहीं माना जाता। इसके विपरीत चांदी को पैरों में पहनने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इसलिए बिछिया के लिए चांदी को पारंपरिक रूप से अधिक उपयुक्त माना गया।

बिछिया टूट जाए तो क्या करना चाहिए?

लोकप्रिय ज्योतिषीय मान्यताओं में बिछिया का टूटना या खो जाना शुभ संकेत नहीं माना जाता। ऐसी स्थिति में कई लोग पुरानी बिछिया को बदलकर नई चांदी की बिछिया पहनते हैं।

हालांकि बिछिया टूटना कई बार सामान्य कारणों जैसे धातु के घिसने, दबाव या लंबे समय तक इस्तेमाल की वजह से भी हो सकता है। इसलिए इसे किसी अनिष्ट का निश्चित संकेत मानना जरूरी नहीं है। परंपरा के अनुसार दोनों पैरों में बिछिया पहनते समय भी समानता और संतुलन का ध्यान रखा जाता है।

बिछिया केवल श्रृंगार नहीं, परंपरा का हिस्सा

भारतीय समाज में बिछिया को लंबे समय से विवाह और सुहाग से जुड़े पारंपरिक आभूषण के रूप में देखा जाता है। अलग-अलग राज्यों और समुदायों में इसे पहनने की शैली, डिजाइन और उंगलियों को लेकर परंपराएं अलग हो सकती हैं।

कहीं बिछिया साधारण चांदी की होती है तो कहीं इसमें डिजाइन और अन्य सजावटी तत्व भी शामिल होते हैं। बदलते समय के साथ इसके डिजाइन में काफी बदलाव आया है, लेकिन पारंपरिक महत्व आज भी कई परिवारों में कायम है।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .