धर्म संवाद / डेस्क : भारत के प्रसिद्ध चार धामों में से एक पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर की पहचान केवल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पूजा के लिए ही नहीं, बल्कि यहां मिलने वाले दिव्य महाप्रसाद के लिए भी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ के भोग को ‘अबाढ़ा’ क्यों कहा जाता है? इसके पीछे एक गहरी धार्मिक मान्यता और सामाजिक संदेश छिपा हुआ है।
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क्या है ‘अबाढ़ा’ का अर्थ?
जगन्नाथ मंदिर की रसोई में तैयार होने वाले भोजन को भोग चढ़ाने से पहले केवल ‘अन्न’ कहा जाता है। लेकिन जैसे ही इस अन्न को मंदिर परिसर में स्थित मां विमला देवी के समक्ष रखकर भगवान जगन्नाथ का तुलसी दल अर्पित किया जाता है, यह महाप्रसाद या अबाढ़ा बन जाता है। ‘अबाढ़ा’ शब्द संस्कृत के ‘अबाधा’ से बना है, जिसका अर्थ है—”जिसमें कोई बाधा, भेदभाव या प्रतिबंध न हो।”
क्यों खास है जगन्नाथ का महाप्रसाद?
प्राचीन समय में जब समाज में छुआछूत और ऊंच-नीच का प्रभाव था, तब भी जगन्नाथ मंदिर के महाप्रसाद पर किसी प्रकार का सामाजिक बंधन नहीं था। इस प्रसाद को राजा से लेकर आम व्यक्ति, ब्राह्मण से लेकर शूद्र तक सभी एक साथ बैठकर ग्रहण कर सकते थे। मान्यता है कि महाप्रसाद कभी अपवित्र नहीं होता। यदि प्रसाद का कोई दाना जमीन पर गिर जाए तो उसे भी श्रद्धा के साथ उठाकर ग्रहण किया जा सकता है।
शबर राजा बिश्वावसु से जुड़ी है ‘अबाढ़ा’ की परंपरा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, पुरी में प्रकट होने से पहले भगवान जगन्नाथ को ओडिशा के जंगलों में शबर जनजाति के राजा बिश्वावसु ‘नीलमाधव’ के रूप में पूजा करते थे। वे अत्यंत सरल तरीके से कंद-मूल और वन उपज का भोग भगवान को अर्पित करते थे। बाद में जब राजा इंद्रद्युम्न ने पुरी में भव्य मंदिर का निर्माण कराया, तब भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि उनकी रसोई पर पहला अधिकार बिश्वावसु के वंशजों का रहेगा और भोजन बिना किसी भेदभाव के तैयार और वितरित किया जाएगा। इसी परंपरा और समानता के संदेश के कारण इस महाप्रसाद को ‘अबाढ़ा’ कहा जाता है।
दो प्रमुख श्रेणियों में बंटा है महाप्रभु का भोग
जगन्नाथ मंदिर के प्रसिद्ध 56 भोग मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किए गए हैं।
1. शंखुड़ी भोग
यह मंदिर की रसोई में मिट्टी के बर्तनों में पकाए जाने वाले मुख्य व्यंजन होते हैं।
प्रमुख व्यंजन:
- कनिका (मीठा पीला चावल)
- खिचड़ी
- ओरिया भात
- मीठा भात
- डालमा
- बेसर
- साग
- महुरा
2. निशंखुड़ी भोग
इस श्रेणी में मिठाइयां, पीठा और सूखे प्रसाद शामिल होते हैं।
प्रमुख व्यंजन:
- पोड़ा पीठा
- एंडुरी पीठा
- आरिसा पीठा
- काकरा पीठा
- अमूलू (मालपुआ)
महाप्रसाद का सबसे लोकप्रिय हिस्सा: खाजा
जगन्नाथ महाप्रसाद में मिलने वाला खाजा सबसे प्रसिद्ध सूखा प्रसाद माना जाता है। इसके अलावा गजा, मगाजा लड्डू और खुड़ुमा भी श्रद्धालुओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। ये प्रसाद लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं, इसलिए भक्त इन्हें अपने साथ घर भी ले जाते हैं।
दिन में 6 बार लगता है भगवान को भोग
भगवान जगन्नाथ को दिनभर में छह अलग-अलग चरणों में भोग अर्पित किया जाता है।
गोपाल वल्लभ भोग (सुबह 8:30 बजे)
नारियल, खोया, फल और हल्का नाश्ता।
सकाल धूप (सुबह 10 बजे)
अमूलू और विभिन्न प्रकार के पीठा।
भोग मंडप (11 बजे से 1 बजे)
चावल, डालमा, बेसर और महुरा।
मध्याह्न धूप (1 बजे से 2 बजे)
कनिका, भात, डालमा और खट्टा।
संध्या धूप (शाम 7 बजे)
भात, दाल और मिठाइयां।
बड़ा सिंगार भोग (रात 11 बजे)
मीठा पखाल, कढ़ी और काकरा पीठा।
क्यों अद्वितीय है जगन्नाथ का महाप्रसाद?
पुरी का महाप्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि समानता, समरसता और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि भगवान जगन्नाथ का ‘अबाढ़ा’ आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है और इसे विश्व की सबसे अनोखी धार्मिक भोजन परंपराओं में गिना जाता है।
