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भगवान शिव ने कब किया था रौद्र तांडव? जानिए रुद्र और आनंद तांडव की पूरी पौराणिक कथा

By Tami

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Shiv Tandav Story

धर्म संवाद / डेस्क : भगवान शिव का तांडव केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि सृष्टि के सृजन, संरक्षण और संहार का दिव्य प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान शिव अत्यधिक क्रोधित होते हैं या परम आनंद की अवस्था में होते हैं, तब वे तांडव करते हैं। शिव पुराण में तांडव के कई रूपों का उल्लेख मिलता है, जिनमें रौद्र तांडव और आनंद तांडव सबसे प्रमुख माने जाते हैं।

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भगवान शिव के तांडव के कितने प्रकार हैं?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव के सात प्रमुख तांडव बताए गए हैं। ये विभिन्न भावों और ब्रह्मांडीय शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें रौद्र तांडव विनाश का, जबकि आनंद तांडव सृष्टि के संतुलन, ज्ञान और मुक्ति का प्रतीक माना जाता है।

माता सती के आत्मदाह के बाद किया था रौद्र तांडव

शिव पुराण के अनुसार, राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन भगवान शिव को उसमें आमंत्रित नहीं किया। इसके बावजूद माता सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंचीं। वहां राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया, जिसे माता सती सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया।

जब भगवान शिव को इस घटना का पता चला तो वे गहरे शोक और प्रचंड क्रोध से भर उठे। उन्होंने अपनी जटा पृथ्वी पर पटकी, जिससे वीरभद्र प्रकट हुए। इसके बाद भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर रौद्र तांडव करने लगे।

रौद्र तांडव से कांप उठी थी पूरी सृष्टि

कथा के अनुसार, भगवान शिव के रौद्र तांडव से पूरी सृष्टि कांप उठी। पृथ्वी पर भूकंप आने लगे, समुद्र उफान मारने लगे और पर्वत हिलने लगे। ऐसा प्रतीत होने लगा कि प्रलय आने वाली है।

तब सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 भाग किए, जो आगे चलकर 51 शक्तिपीठों के रूप में पूजे जाने लगे। माता सती का शरीर अलग होने के बाद भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ और रौद्र तांडव समाप्त हुआ।

क्या है भगवान शिव का आनंद तांडव?

भगवान शिव का आनंद तांडव उनके नटराज स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। यह अज्ञान के नाश, ज्ञान की प्राप्ति और सृष्टि में संतुलन का संदेश देता है। पौराणिक कथा के अनुसार, कुछ ऋषियों को अपनी विद्या और तपस्या पर अत्यधिक अहंकार हो गया था। उनका घमंड दूर करने के लिए भगवान शिव एक भिक्षुक के वेश में उनके आश्रम पहुंचे।

क्रोधित ऋषियों ने अपनी मंत्र शक्ति से भगवान शिव पर विषैला सांप, बाघ और अंत में एक बौने दैत्य को छोड़ दिया। भगवान शिव ने सांप को अपने गले में धारण कर लिया, बाघ की खाल को वस्त्र बना लिया और बौने दैत्य को अपने पैर के नीचे दबा दिया।

नटराज रूप का आध्यात्मिक संदेश

इसके बाद भगवान शिव ने उसी दैत्य की पीठ पर खड़े होकर आनंद तांडव किया। उनके एक हाथ में डमरू, दूसरे हाथ में अग्नि, एक पैर से अहंकार का दमन और दूसरा पैर मोक्ष का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव के इस दिव्य स्वरूप को देखकर ऋषियों का अहंकार समाप्त हो गया और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी।

रौद्र तांडव और आनंद तांडव का महत्व

  • रौद्र तांडव – अन्याय, अधर्म और अहंकार के विनाश का प्रतीक।
  • आनंद तांडव – ज्ञान, संतुलन, सृजन और मोक्ष का प्रतीक।
  • दोनों तांडव यह संदेश देते हैं कि सृष्टि में विनाश और सृजन एक-दूसरे के पूरक हैं और संतुलन बनाए रखना ही जीवन का मूल सिद्धांत है।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .

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