धर्म संवाद / डेस्क : ग्रहण को हमेशा से ही प्रभावशाली घटना माना गया है। चाहे वो सूर्य ग्रहण हो या चंद्र ग्रहण । ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में इसे शुभ नहीं माना जाता। सूर्य और चंद्र ग्रहण का असर केवल वैज्ञानिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होता है। हिन्दू सनातन धर्म में ग्रहण को शुभ नहीं माना जाता है। इसलिए इस दौरान शुभ कार्य करने की मनाही होती है।
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के दौरान सूर्य देव या चंद्र देव राहु-केतु के प्रभाव में आ जाते हैं। इससे उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है और चारों ओर नकारात्मकता फैलने लगती है। यही कारण है कि इस समय को अशुभ माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार, ग्रहण के दौरान आसुरी शक्तियां प्रभावी हो जाती हैं, जिससे शुभ कार्यों में विघ्न पड़ सकता है।
ग्रहण से कुछ घंटे पहले ही सूतक काल लग जाता है, जो ग्रहण समाप्त होने तक रहता है। इस दौरान मंदिरों के द्वार बंद कर दिए जाते हैं और पूजा-पाठ पर रोक लग जाती है। ऐसा माना जाता है कि ग्रहण के दौरान किए गए किसी भी कार्य का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए इस समय कोई भी शुभ कार्य करने की मनाही होती है।
माना जाता है कि इस समय देवताओं की कृपा प्राप्त करने के लिए किए जाने वाले पूजा-पाठ का उचित फल नहीं मिलता। मंत्र जाप, हवन और देव आराधना करने से लाभ की बजाय हानि हो सकती है। इस वजह से इस समय पूजा-पाठ नहीं किया जाता ।
ऐसा माना जाता है कि इस दौरान भोजन दूषित हो जाता है, जिससे बीमारियां हो सकती हैं। यही वजह है कि ग्रहण के समय पका हुआ भोजन खाने से बचने और इसे तुलसी के पत्ते डालकर सुरक्षित करने की परंपरा है। ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान करना जरूरी होता है, जिससे शरीर और मन की शुद्धि होती है।
वैज्ञानिक भी कहते हैं कि ग्रहण के दौरान कुछ हानिकारक किरणें उत्सर्जित होती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती हैं। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं को इस समय सतर्क रहने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इसका प्रभाव अजन्मे शिशु पर भी पड़ सकता है। इसी कारण ग्रहण के दौरान सावधानी बरतने और धार्मिक नियमों का पालन करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
ग्रहण के समय सूर्य या चंद्रमा की किरणें थोड़ी विकृत हो सकती हैं, जिससे कुछ लोगों को सिरदर्द, थकान या बेचैनी महसूस हो सकती है। प्राचीन काल में, लोग बिना सुरक्षा उपायों के सूर्य ग्रहण को नंगी आँखों से देखते थे, जिससे आँखों को नुकसान पहुंच सकता था। यही कारण है कि इसे देखने से मना किया जाता है ।