Ujjain Gopal Mandir: जन्माष्टमी के बाद क्यों नहीं होती शयन आरती? जानें अनोखी परंपरा

By Tami

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Ujjain Gopal Mandir

धर्म संवाद / डेस्क : बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां महाकालेश्वर मंदिर के अलावा कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी धार्मिक परंपराएं और मान्यताएं बेहद खास हैं। इन्हीं में से एक है गोपाल मंदिर, जहां भगवान द्वारकाधीश की अनोखी परंपरा आज भी निभाई जाती है।

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जन्माष्टमी के बाद इस मंदिर में कुछ दिनों तक भगवान की सायंकालीन शयन आरती नहीं की जाती। इसके पीछे भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़ी एक विशेष धार्मिक मान्यता बताई जाती है। आइए जानते हैं क्या है यह परंपरा और कब से दोबारा शुरू होती है शयन आरती।

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जन्माष्टमी के बाद क्यों नहीं होती शयन आरती?

गोपाल मंदिर के पुजारी के अनुसार, जन्माष्टमी के बाद भगवान को बाल स्वरूप में माना जाता है। बाल रूप में भगवान के सोने और जागने का कोई निश्चित समय नहीं माना जाता। इसी मान्यता के चलते जन्माष्टमी के बाद मंदिर में कुछ दिनों तक भगवान की नियमित शयन आरती नहीं की जाती। भक्तों के लिए यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी आस्था का प्रतीक है।

बारस तिथि पर होती है माखन-मटकी की लीला

मान्यता के अनुसार, बारस तिथि पर भगवान के बड़े होने की परंपरा निभाई जाती है। इस अवसर पर मंदिर में भगवान की बाल लीला का आयोजन किया जाता है। मंदिर में माखन-मटकी फोड़ने की परंपरा निभाई जाती है और इसके बाद भगवान की शयन आरती की जाती है। इसके साथ ही मंदिर में नियमित पूजा और आरती का क्रम फिर से शुरू हो जाता है।

सिंधिया शासनकाल से जुड़ी है गोपाल मंदिर की परंपरा

उज्जैन का गोपाल मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व भी रखता है। मंदिर की निर्माण परंपरा सिंधिया शासनकाल और बैजीबाई शिंदे से जुड़ी मानी जाती है।

मराठा स्थापत्य शैली में निर्मित यह मंदिर अपनी विशिष्ट वास्तुकला के लिए जाना जाता है। मंदिर के चांदी के दरवाजे भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र हैं। यही वजह है कि गोपाल मंदिर को उज्जैन की धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

बछ बारस तक बदलती रहती है भगवान की दिनचर्या

जन्माष्टमी के बाद शुरू होने वाली यह विशेष परंपरा बछ बारस तक चलती है। बछ बारस के दिन मंदिर में दोपहर करीब 12 बजे मटकी फोड़ने की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद भगवान की शयन आरती की जाती है। आगे निर्धारित तिथि से मंदिर में रात 9 बजे नियमित शयन आरती का क्रम शुरू हो जाता है। इस तरह जन्माष्टमी से लेकर बछ बारस तक भगवान की दिनचर्या को बाल स्वरूप की धार्मिक मान्यता के अनुरूप रखा जाता है।

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भक्तों के लिए क्यों खास है यह परंपरा?

गोपाल मंदिर की यह परंपरा केवल पूजा-पद्धति का हिस्सा नहीं है, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप और उनकी बाल लीलाओं के प्रति भक्तों की श्रद्धा को भी दर्शाती है। भगवान को बाल रूप में मानकर उनकी दिनचर्या में भी उसी भाव को शामिल किया जाता है। माखन-मटकी फोड़ने की परंपरा श्रीकृष्ण की प्रसिद्ध बाल लीलाओं की याद दिलाती है और मंदिर में इस दौरान विशेष धार्मिक माहौल देखने को मिलता है।

उज्जैन का गोपाल मंदिर क्यों है खास?

उज्जैन आने वाले श्रद्धालुओं के लिए गोपाल मंदिर एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। बाबा महाकाल के दर्शन के साथ भक्त भगवान द्वारकाधीश के दर्शन के लिए भी यहां पहुंचते हैं। मंदिर की प्राचीन परंपराएं, मराठा स्थापत्य और चांदी के दरवाजे इसे धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टि से खास बनाते हैं।

FAQ: गोपाल मंदिर और जन्माष्टमी से जुड़े सवाल

सवाल: उज्जैन का गोपाल मंदिर किस भगवान को समर्पित है?
जवाब: उज्जैन का गोपाल मंदिर भगवान द्वारकाधीश यानी श्रीकृष्ण को समर्पित है।

सवाल: जन्माष्टमी के बाद गोपाल मंदिर में शयन आरती क्यों नहीं होती?
जवाब: धार्मिक मान्यता के अनुसार जन्माष्टमी के बाद भगवान को बाल स्वरूप में माना जाता है। इसलिए उनके सोने-जागने का निश्चित समय नहीं माना जाता और कुछ दिनों तक नियमित शयन आरती नहीं होती।

सवाल: गोपाल मंदिर में मटकी कब फोड़ी जाती है?
जवाब: बछ बारस के अवसर पर मंदिर में दोपहर करीब 12 बजे माखन-मटकी फोड़ने की परंपरा निभाई जाती है।

सवाल: गोपाल मंदिर किस शासनकाल से जुड़ा है?
जवाब: मंदिर की निर्माण परंपरा सिंधिया शासनकाल और बैजीबाई शिंदे से जुड़ी मानी जाती है।

सवाल: गोपाल मंदिर की सबसे खास विशेषता क्या है?
जवाब: मंदिर की धार्मिक परंपराओं के अलावा इसकी मराठा स्थापत्य शैली और चांदी के दरवाजे विशेष आकर्षण का केंद्र हैं।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .