धर्म संवाद / डेस्क : सनातन परंपरा में शुक्रवार का दिन धन और ऐश्वर्य की देवी मां लक्ष्मी की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां लक्ष्मी को समृद्धि, वैभव और सुख-संपन्नता की देवी कहा गया है। यही वजह है कि शुक्रवार के दिन भक्त देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा, मंत्र जाप और स्तुति करते हैं।
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मां लक्ष्मी की आराधना में कनकधारा स्तोत्र का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-शांति व समृद्धि का वातावरण बना रहता है।
क्या है कनकधारा स्तोत्र?
कनकधारा स्तोत्र मां लक्ष्मी की स्तुति में रचा गया प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है। परंपरा के अनुसार इसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। इसमें देवी लक्ष्मी के स्वरूप, गुणों और उनकी कृपा का वर्णन किया गया है। कनकधारा स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से आर्थिक समृद्धि और देवी लक्ष्मी की कृपा की कामना से किया जाता है। शुक्रवार के दिन इसकी पूजा और पाठ को विशेष फलदायी मानने की धार्मिक परंपरा है।
कनकधारा स्तोत्र
अगं हरे: पुलकभूषण माश्रयन्ती
भूङ्गाङ्गनेव मुकुलाधरणं तमालम्।
अगीकृताखिलविभतिरपागलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मगळदेवतायाः ।।1।।
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारे:
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया: ।।2।।
विश्वामरेन्द्र पदविभ्रम दान दक्षम्
आनन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धम्
इन्दीवरोदर सहोदरमिन्दिराय: ।।3।।
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्
आनन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांगनाया: ।।4।।
बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला
कल्याण मावहतु मे कमलालयाया: ।।5।।
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्
धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्ति
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया: ।।6।।
प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्
मांगल्य भाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।
मय्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया: ।।7।।
दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम्
अस्मिन्नकिञ्चन विहंग शिशौ विषण्णे।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह: ।।8।।
इष्टा विशिष्टमतयोअपि यया दयार्द्र
दृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।
दृष्टिः प्रह्ष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कुषीष्ट मम पुष्करविष्टराया: ।।9।।
गीर्देवतैति गरुड़ध्वज सुन्दरीति
शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायें
तस्यै नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।
श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोऽस्तु शतपत्र निकेतानायै
पुष्टयै नमोऽस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै ।।11।।
नमोऽस्तु नालीक निभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै।
नमोऽस्तु सोमामृत सोदरायै
नमोऽस्तु नारायण वल्लभायै ।।12।।
नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै
नमोऽस्त भुमण्डलनायिकायै।
नमोऽस्तु देवादिदयापरायै
नमोऽस्तु शार्ङगायुधवल्लभायै ।।13।।
नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै
नमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै
नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ।।14।।
नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै
नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै।
नमोऽस्तु देवादिभिर्चितायै
नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ।।15।।
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि
साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणणोद्यतानि
मामेव मातर निशं कलयन्तु मान्ये ।।16।।
यत्कटाक्षसमुपासना विधि:
सेवकस्य सकलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानर्सेसस्
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ।।17।।
सरसिजनिलये सरोज हस्ते
धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ।।18।।
दिग्घस्तिभिः कनककुंभमुखा व सृष्ट
स्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष
लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम् ।।19।।
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं
करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया:।।20।।
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते बुधभाविताशया: ।।21।।
कनकधारा स्तोत्र की रचना की क्या है कथा?
कनकधारा स्तोत्र से जुड़ी एक प्रसिद्ध धार्मिक कथा आदि शंकराचार्य के जीवन से संबंधित है। कहा जाता है कि एक बार आदि शंकराचार्य भिक्षा मांगने के लिए एक गरीब ब्राह्मण महिला के घर पहुंचे। उस महिला के पास देने के लिए बहुत कम सामान था। घर में खोजने पर उसे केवल एक आंवला फल मिला।
महिला ने अपनी गरीबी के बावजूद बिना किसी स्वार्थ के वही आंवला फल भिक्षा के रूप में आदि शंकराचार्य को दे दिया। महिला की इस निस्वार्थ भावना से आदि शंकराचार्य अत्यंत प्रभावित हुए। धार्मिक कथा के अनुसार, उन्होंने देवी लक्ष्मी की स्तुति करते हुए कनकधारा स्तोत्र की रचना की और मां लक्ष्मी से उस गरीब महिला पर कृपा करने की प्रार्थना की।
कहा जाता है कि स्तोत्र से प्रसन्न होकर देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं। आदि शंकराचार्य ने देवी से उस महिला के घर में सुख-समृद्धि प्रदान करने का अनुरोध किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां लक्ष्मी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और महिला का जीवन खुशहाल हो गया।
शुक्रवार को कनकधारा स्तोत्र का पाठ क्यों करें?
हिंदू धार्मिक परंपरा में शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी की आराधना के लिए शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त घर में दीप जलाकर देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं और उनकी स्तुति करते हैं। ऐसी मान्यता है कि शुक्रवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। इससे घर में धन-धान्य, सुख और शांति की प्राप्ति की कामना की जाती है। हालांकि, इन परिणामों को धार्मिक मान्यता के रूप में ही समझना चाहिए। आर्थिक समृद्धि के लिए मेहनत, सही वित्तीय योजना और जिम्मेदार निर्णय भी आवश्यक हैं।
कनकधारा स्तोत्र का पाठ कैसे करें?
अगर आप शुक्रवार को कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना चाहते हैं तो धार्मिक परंपरा के अनुसार इस तरह पूजा कर सकते हैं:






