धर्म संवाद / डेस्क : महाकाल की नगरी उज्जैन में आयोजित एक विशेष धर्म संसद में भस्म आरती को लेकर बड़ा सवाल सामने आया। चर्चा के दौरान जब पूछा गया कि क्या महिलाओं को भगवान महाकाल की भस्म आरती देखने की अनुमति है, तो जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी सतीशाचार्य महाराज ने इस पर स्पष्ट जवाब दिया। उन्होंने कहा कि भस्म आरती देखने से किसी को मनाही नहीं है।
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उज्जैन में आयोजित ‘The Immortal of Ujjain’ कार्यक्रम में सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में स्वामी सतीशाचार्य महाराज के अलावा रिटायर्ड IAS अधिकारी मनोज श्रीवास्तव और कथावाचक पंडित श्यान मानावत भी शामिल हुए। तीनों वक्ताओं ने युवाओं से भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं को समझने की अपील की। वक्ताओं का कहना था कि नई पीढ़ी को केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित रहने के बजाय उनके पीछे छिपे दर्शन और उद्देश्य को भी समझना चाहिए।
सनातन धर्म सिर्फ पूजा-पद्धति नहीं
स्वामी सतीशाचार्य महाराज ने सनातन धर्म को लेकर कहा कि यह केवल पूजा-पाठ की व्यवस्था नहीं है, बल्कि जीवन जीने की एक व्यापक दिशा है। उन्होंने युवाओं से वेद, पुराण और शास्त्रों का अध्ययन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि उज्जैन की पहचान केवल महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से नहीं है। यह शहर सदियों से ज्ञान, साधना और तप की भूमि रहा है। यहां संतों और विद्वानों ने लंबे समय तक आध्यात्मिक साधना की है।
युवाओं को शास्त्रों का ज्ञान क्यों जरूरी?
धर्म संसद में वक्ताओं ने कहा कि युवा पीढ़ी को धर्म से जोड़ने के लिए सिर्फ कर्मकांड बताना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी समझाना जरूरी है कि किसी धार्मिक परंपरा के पीछे क्या विचार और उद्देश्य है। स्वामी सतीशाचार्य महाराज के अनुसार, शास्त्रों का अध्ययन व्यक्ति को जीवन में सही निर्णय लेने और परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझने की क्षमता देता है। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, न कि लोगों के बीच भेद पैदा करना।
भस्म आरती को लेकर उठा सवाल
कार्यक्रम के दौरान भगवान महाकाल की भस्म आरती को लेकर भी सवाल पूछा गया। चर्चा इस बात पर हुई कि भस्म आरती का धार्मिक महत्व क्या है और क्या इसे देखने को लेकर महिलाओं के लिए कोई प्रतिबंध है। इस पर स्वामी सतीशाचार्य महाराज ने भस्म के आध्यात्मिक महत्व को समझाते हुए कहा कि भगवान शिव का स्वरूप जीवन और मृत्यु के सत्य की ओर संकेत करता है। उन्होंने कहा कि भस्म यह संदेश देती है कि जीवन में अंत ही एक नए आरंभ का आधार भी बन सकता है। शिव उपासना में भस्म का विशेष महत्व इसी आध्यात्मिक विचार से जुड़ा हुआ है।
क्या महिलाओं को भस्म आरती देखने की मनाही है?
भस्म आरती को लेकर सबसे अहम सवाल यही था कि क्या महिलाओं को महाकाल की भस्म आरती देखने की अनुमति नहीं है? इस पर स्वामी सतीशाचार्य महाराज ने कहा कि महिलाओं को भस्म आरती देखने की कोई मनाही नहीं है। उन्होंने कहा कि स्त्री और पुरुष बाहरी पहचान हैं, जबकि भीतर आत्मा समान है।
उन्होंने आगे कहा कि समय और व्यवस्थाओं के अनुसार अलग-अलग परंपराएं विकसित हुई हैं, लेकिन व्यवस्थाएं समय के साथ बदलती भी रहती हैं। उनके अनुसार भगवान शिव स्वयं परिवर्तन के प्रतीक हैं और भस्म भी इसी परिवर्तन और नश्वरता का संदेश देती है।
धर्म के साथ करुणा और सेवा जरूरी
धर्म संसद में धार्मिक शिक्षा के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि धार्मिक आचरण तभी सार्थक माना जा सकता है, जब उसमें करुणा, सेवा और दूसरों के प्रति सम्मान शामिल हो। स्वामी सतीशाचार्य महाराज ने युवाओं को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि परिवार और शिक्षण संस्थानों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है।
युवाओं तक पहुंचे भारतीय संस्कृति का संदेश
कार्यक्रम में वक्ताओं का जोर इस बात पर रहा कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को केवल धार्मिक अनुष्ठानों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे मौजूद दर्शन और जीवन मूल्यों को भी समझना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की समझ अगली पीढ़ी तक पहुंचाना केवल संतों या धार्मिक संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है।






