धर्म संवाद / डेस्क : सनातन धर्म में भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में विराजमान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र हैं। भगवान जगन्नाथ की भक्ति में कई स्तोत्रों का विशेष महत्व बताया गया है, जिनमें ‘श्री जगन्नाथ अष्टकम्’ अत्यंत प्रभावशाली और पुण्यदायी माना जाता है।
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा और भक्ति के साथ श्री जगन्नाथ अष्टकम् का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
क्या है श्री जगन्नाथ अष्टकम्?
श्री जगन्नाथ अष्टकम् भगवान जगन्नाथ की महिमा का वर्णन करने वाला एक दिव्य स्तोत्र है। इसमें आठ श्लोकों के माध्यम से भगवान के स्वरूप, उनकी लीलाओं और उनकी असीम कृपा का वर्णन किया गया है। प्रत्येक श्लोक का अंत इस प्रार्थना के साथ होता है—
“जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे”
अर्थात्, “हे जगन्नाथ स्वामी! आप सदैव मेरी दृष्टि और मेरे हृदय में विराजमान रहें।”
श्री जगन्नाथ अष्टकम्
कदाचित् कालिन्दी-तट-विपिन-संगीत-तरलो
मुदा गोपी-नारी-वदन-कमलास्वाद-मधुपः।
रमा-शम्भु-ब्रह्मामर-पति-गणेशार्चित-पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥१॥
भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखि-पिच्छं कटि-तटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते।
सदा श्रीमद्-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥२॥
महाम्भोधेस्तीरे कनक-रुचिरे नील-शिखरे
वसन् प्रासादान्तः सहज-बलभद्रेण बलिना।
सुभद्रा-मध्यस्थः सकल-सुर-सेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥३॥
कृपा-पारावारः सजल-जलद-श्रेणि-रुचिरो
रमा-वाणी-सौम-स्फुरद-मल-पद्मेक्षण-मुखः।
सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुति-गण-शिखा-गीत-चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥४॥
रथारूढो गच्छन् पथि मिलित-भूदेव-पटलैः
स्तुति-प्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः।
दयासिन्धुर्बन्धुः सकल-जगतां सिन्धु-सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥५॥
परब्रह्मापीडः कुवलय-दलोत्त्फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि।
रसानन्दो राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥६॥
न वै याचे राज्यं न च कनक-माणिक्य-विभवं
न याचेऽहं रम्यां सकल-जन-काम्यां वर-वधूम्।
सदा काले काले प्रमथ-पतिना गीत-चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥७॥
हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते।
अहो दीनानाथं निहितमचलं निश्चितपदं
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥८॥
फलश्रुति
जगन्नाथाष्टकं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥
अर्थ: जो भक्त श्रद्धा और पवित्र मन से श्री जगन्नाथ अष्टकम् का पाठ करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त करता है।
जय जगन्नाथ!
श्री जगन्नाथ अष्टकम् के पाठ का महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भक्त को भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र व्यक्ति के मन को शांति प्रदान करता है और भगवान के प्रति भक्ति को और अधिक मजबूत बनाता है।
श्री जगन्नाथ अष्टकम् के पाठ से मिलने वाले लाभ
- भगवान जगन्नाथ की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
- जीवन की बाधाएं और नकारात्मकता दूर होती हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वर के प्रति समर्पण बढ़ता है।
- परिवार में सुख, समृद्धि और खुशहाली आती है।
- पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
कब करना चाहिए श्री जगन्नाथ अष्टकम् का पाठ?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद भगवान जगन्नाथ की पूजा के समय इस स्तोत्र का पाठ करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा, जगन्नाथ रथ यात्रा, स्नान पूर्णिमा, एकादशी और गुरुवार के दिन इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
पाठ करने की सही विधि
- प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीप और धूप जलाएं।
- भगवान को तुलसी दल, फूल और प्रसाद अर्पित करें।
- श्रद्धापूर्वक श्री जगन्नाथ अष्टकम् का पाठ करें।
- अंत में भगवान से सुख, शांति और कल्याण की प्रार्थना करें।
