धर्म संवाद / डेस्क : हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने वाला बेहद पावन व्रत माना जाता है। सावन महीने में आने वाले प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से सुख-शांति, समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
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इसी धार्मिक परंपरा से जुड़ी एक खास मान्यता उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में भी निभाई जाती है। मान्यता के अनुसार, उज्जैन के राजा भगवान महाकाल भी सावन के सोमवार और प्रदोष के दिन भक्तों की तरह फलाहार करते हैं। आइए जानते हैं महाकाल मंदिर में इस परंपरा को किस तरह निभाया जाता है और सावन का अंतिम भौम प्रदोष व्रत कब है।
सावन का अंतिम भौम प्रदोष व्रत कब है?
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य आनंद भारद्वाज के अनुसार, सावन का अंतिम भौम प्रदोष व्रत 25 अगस्त 2026 को है। त्रयोदशी तिथि 25 अगस्त की सुबह 6 बजकर 20 मिनट से शुरू होगी और 26 अगस्त 2026 की सुबह 7 बजकर 59 मिनट पर समाप्त होगी। मंगलवार के दिन पड़ने के कारण इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। भगवान शिव की आराधना के लिए यह दिन विशेष माना जाता है।
कब-कब व्रत रखते हैं उज्जैन के राजा महाकाल?
महाकाल मंदिर के पुजारी महेश शर्मा के अनुसार, भगवान महाकालेश्वर श्रावण और भाद्रपद महीने में विशेष धार्मिक परंपराओं के तहत नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इस दौरान श्रावण के प्रत्येक सोमवार और प्रदोष के दिन भगवान महाकाल फलाहार करते हैं।
बताया जाता है कि देर शाम नगर भ्रमण से मंदिर लौटने के बाद भगवान महाकाल को संपूर्ण भोग अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ये दिन त्याग और तपस्या से जुड़े होते हैं। इसलिए बाबा महाकाल भी अपने भक्तों की तरह फलाहार कर इस भाव को प्रकट करते हैं।
कैसे निभाई जाती है महाकाल की व्रत परंपरा?
पुजारी महेश शर्मा बताते हैं कि भगवान महाकाल को उज्जैन का राजा माना जाता है। बाबा की सेवा में पुजारी परिवारों की ओर से कई प्राचीन परंपराएं निभाई जाती हैं।
सामान्य दिनों में भगवान महाकाल को नियमित रूप से भोग लगाया जाता है, लेकिन श्रावण और भादो महीने में एक समय भोजन की परंपरा बताई जाती है। सुबह से शाम तक फलाहार और शकर के पानी का भोग अर्पित किया जाता है। नगर भ्रमण से लौटने के बाद भगवान को संपूर्ण भोग लगाया जाता है। इस परंपरा को भगवान महाकाल के त्याग, तपस्या और भक्तों के साथ उनके आत्मीय संबंध से जोड़कर देखा जाता है।
भगवान महाकाल को कौन-सा भोग प्रिय है?
भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र, धतूरा और भांग का विशेष महत्व माना जाता है। महाकाल को मेवा और भांग का भोग भी अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव को सच्ची श्रद्धा से अर्पित किया गया भोग स्वीकार्य होता है। शिव पूजा में बेलपत्र का विशेष स्थान है। भक्त प्रदोष के दिन बेलपत्र, धतूरा, भांग और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर भगवान महाकाल से सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।
प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। मान्यता है कि प्रदोष काल में शिव-पार्वती की पूजा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। सावन के दौरान पड़ने वाला प्रदोष व्रत शिव भक्तों के लिए विशेष अवसर माना जाता है। भक्त इस दिन उपवास रखते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और बेलपत्र, धतूरा, भांग, फल एवं अन्य सामग्री अर्पित करते हैं। श्रद्धा के साथ की गई पूजा से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आने की धार्मिक मान्यता है।
महाकाल की परंपरा क्यों है खास?
उज्जैन में भगवान महाकाल को केवल आराध्य देव ही नहीं, बल्कि नगर का राजा माना जाता है। यही वजह है कि महाकाल से जुड़ी प्रत्येक धार्मिक परंपरा का अपना विशेष महत्व है। सावन और प्रदोष के दिनों में भगवान का फलाहार करना भक्तों के लिए भी एक भावनात्मक और धार्मिक संदेश माना जाता है। यह परंपरा भगवान शिव के त्याग, तपस्या और भक्तों के प्रति उनके जुड़ाव को दर्शाती है।
