धर्म संवाद / डेस्क : पितृ पक्ष का समय हिंदू धर्म में पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए विशेष माना जाता है। इन दिनों परिवार के दिवंगत सदस्यों के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में श्रद्धापूर्वक किए गए कर्म पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम हैं।
यह भी पढ़े : Pitru Paksha 2026: पितृ पक्ष में पीपल के 21 पत्तों का ये उपाय, जानें क्या है धार्मिक मान्यता
वर्ष 2026 में पितृ पक्ष 10 अक्टूबर तक चलेगा। इस दौरान अलग-अलग तिथियों पर दिवंगत परिजनों के लिए श्राद्ध किया जाता है। आज, 30 सितंबर को चतुर्थी तिथि का श्राद्ध किया जा रहा है। पितृ पक्ष से जुड़े नियमों और परंपराओं का उल्लेख कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी श्राद्ध कर्म की परंपरा और इससे जुड़ी एक महत्वपूर्ण कथा का वर्णन मिलता है।
महाभारत में श्राद्ध की शुरुआत से जुड़ी है महर्षि निमि की कथा
महाभारत के अनुशासन पर्व में युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से श्राद्ध कर्म की शुरुआत और इसकी परंपरा के बारे में सवाल किया था। उन्होंने पूछा था कि श्राद्ध कर्म कब से प्रचलित हुआ और सबसे पहले किसने अपने पूर्वजों के लिए यह कर्म किया?
इसके जवाब में भीष्म पितामह ने महर्षि निमि से जुड़ी कथा सुनाई। धार्मिक कथा के अनुसार, ब्रह्मा जी से अत्रि मुनि की उत्पत्ति हुई और अत्रि मुनि के वंश में आगे चलकर भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ। इसी परंपरा में महर्षि निमि का भी उल्लेख मिलता है।
महर्षि निमि के पुत्र का नाम श्रीमान बताया गया है। कम उम्र में ही उनके पुत्र की मृत्यु हो गई। पुत्र की मृत्यु से निमि ऋषि बेहद दुखी हुए। इसी शोक के बीच उन्होंने अमावस्या के दिन अपने पुत्र के लिए श्राद्ध कर्म करने का निर्णय लिया।
उन्होंने ब्राह्मणों को भोजन कराया और पुत्र के निमित्त पिंडदान किया। धार्मिक परंपरा में इस घटना को श्राद्ध कर्म की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। इसके बाद पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और अन्य धार्मिक कर्म करने की परंपरा आगे बढ़ने की मान्यता है।
महाभारत में पितरों से जुड़े देवताओं का भी वर्णन
महाभारत में पितरों और श्राद्ध कर्म से जुड़ी कई मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। धार्मिक परंपरा में ब्रह्मा, पुलस्त्य, वसिष्ठ, अंगिरा और महर्षि कश्यप आदि का पितरों से संबंधित प्रसंगों में उल्लेख किया गया है।
पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने परिवार के दिवंगत सदस्यों को याद करते हैं। उनके निमित्त तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध और अन्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं। इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना भी माना जाता है।
पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का क्या महत्व है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष में श्रद्धा से किए गए श्राद्ध और तर्पण से पितरों को शांति प्राप्त होती है। इस अवधि को अपने पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर माना जाता है।
श्राद्ध कर्म केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि परिवार की पिछली पीढ़ियों को याद करने की परंपरा भी है। इस दौरान लोग अपने सामर्थ्य के अनुसार पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन, दान और पितरों के निमित्त अन्य सेवा कार्य करते हैं।
पितृ पक्ष में पितरों के लिए धूप-ध्यान कैसे करें?
पितृ पक्ष में कई परिवारों में पितरों के निमित्त धूप-ध्यान करने की परंपरा भी है। इसके लिए बहुत अधिक सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। श्रद्धा और साफ-सफाई के साथ इसे किया जा सकता है।
धूप-ध्यान के लिए जरूरी सामग्री
- गाय के गोबर से बने कंडे
- धूप देने के लिए हवन कुंड या सुरक्षित अग्नि पात्र
- घी
- काले तिल
- चावल
- गुड़
- कपूर
- जल से भरा तांबे का लोटा
- फूल
- बैठने के लिए आसन
अगर सभी सामग्री उपलब्ध न हो तो भी पितरों का स्मरण किया जा सकता है। उपलब्ध सामग्री के अनुसार जल, काले तिल, कंडे के अंगारे, गुड़ और घी का उपयोग करके श्रद्धापूर्वक धूप-ध्यान किया जा सकता है।
पितरों को धूप देने की सरल विधि
सबसे पहले पूजा या धूप देने वाले स्थान को साफ कर लें। इसके बाद आसन पर बैठकर पितरों का स्मरण करें। सुरक्षित स्थान पर कंडे जलाकर उनके अंगारे तैयार करें।
अंगारों पर थोड़ी मात्रा में घी, गुड़, काले तिल और चावल अर्पित कर धूप दी जा सकती है। इस दौरान मन में अपने दिवंगत परिजनों और पूर्वजों का स्मरण करें।
इसके बाद तांबे के लोटे में रखे जल से पितरों का ध्यान करते हुए तर्पण किया जा सकता है। परिवार की परंपरा और मान्यताओं के अनुसार मंत्र या प्रार्थना का जाप करें।
धूप देते समय अग्नि की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें। बच्चों और ज्वलनशील वस्तुओं को अग्नि से दूर रखें।
खीर-पूड़ी से भी किया जाता है पितरों का स्मरण
पितृ पक्ष में कई घरों में पितरों के निमित्त खीर-पूड़ी तैयार करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धा से तैयार किए गए भोजन को पितरों के निमित्त अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार ब्राह्मण भोजन, दान या जरूरतमंदों को भोजन कराया जा सकता है।
हालांकि, श्राद्ध और तर्पण की विधि अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में अलग हो सकती है। इसलिए अपने कुलाचार, पारिवारिक परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कर्म करना उचित माना जाता है।
पितृ पक्ष में सबसे जरूरी है श्रद्धा
पितृ पक्ष का मूल भाव अपने पूर्वजों को याद करना और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना है। श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, धूप-ध्यान या दान जैसे कर्म अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार किए जा सकते हैं।
धार्मिक मान्यता में भी ‘श्रद्धा’ को श्राद्ध कर्म का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना गया है। इसलिए सामग्री अधिक होने की बजाय मन में पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और श्रद्धा का भाव होना महत्वपूर्ण माना जाता है।
नोट: यहां दी गई धार्मिक जानकारियां प्रचलित मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में श्राद्ध कर्म की विधि और नियमों में अंतर हो सकता है।






