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नासिक कुंभ मेला कब शुरू होगा? 31 अक्टूबर के धर्म ध्वजारोहण का सच

By Tami

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Nashik Kumbh Mela, Simhastha Kumbh 2027

धर्म संवाद / डेस्क : नासिक और त्र्यंबकेश्वर में 31 अक्टूबर को राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री की मौजूदगी में धर्म ध्वजारोहण का आयोजन हुआ। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई पोस्ट वायरल होने लगीं, जिनमें दावा किया गया कि नासिक कुंभ मेला शुरू हो गया है। हालांकि, यह दावा पूरी तरह सही नहीं है। 31 अक्टूबर को हुआ धर्म ध्वजारोहण सिंहस्थ कुंभ की धार्मिक तैयारियों की एक महत्वपूर्ण शुरुआत है, लेकिन इसे कुंभ मेले का औपचारिक शुभारंभ नहीं कहा जा सकता।

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दरअसल, कुंभ मेले की शुरुआत केवल धर्म ध्वजा फहराने से नहीं होती। इसके लिए अखाड़ों की स्थापना, साधु-संतों और संन्यासियों का आगमन, छावनियों का निर्माण, पेशवाई और धार्मिक गतिविधियों की शुरुआत जैसी कई महत्वपूर्ण परंपराएं निभाई जाती हैं। ऐसे में सवाल है कि आखिर नासिक कुंभ मेला कब शुरू होगा और अखाड़ों की धर्म ध्वजा तथा पेशवाई की तारीख क्या है? आइए जानते हैं।

31 अक्टूबर को धर्म ध्वजारोहण, क्या शुरू हो गया नासिक कुंभ?

नासिक और त्र्यंबकेश्वर में 31 अक्टूबर को धर्म ध्वजारोहण को सिंहस्थ कुंभ की तैयारियों का महत्वपूर्ण धार्मिक पड़ाव माना जा रहा है। इस आयोजन का संबंध गुरु के सिंह राशि में प्रवेश और सिंहस्थ की धार्मिक परंपरा से है।

हालांकि, धर्म ध्वजारोहण और कुंभ मेले का औपचारिक आयोजन दो अलग-अलग बातें हैं। धर्म ध्वजा की स्थापना धार्मिक गतिविधियों की शुरुआत का संकेत देती है, जबकि कुंभ मेले का वास्तविक स्वरूप तब सामने आता है, जब देशभर से साधु-संत, तपस्वी, बैरागी और संन्यासी अपने-अपने अखाड़ों की छावनियों में पहुंचते हैं।

इसके बाद यज्ञ, हवन, कथा, प्रवचन, भजन-कीर्तन और भंडारे जैसे धार्मिक आयोजन शुरू होते हैं। इसलिए 31 अक्टूबर के धर्म ध्वजारोहण को कुंभ मेले का शुभारंभ बताना उचित नहीं होगा।

क्या होता है कुंभ मेला? पहले समझिए मेले का अर्थ

कुंभ मेले की परंपरा और उसके स्वरूप को समझने के लिए सबसे पहले ‘मेला’ शब्द का अर्थ जानना जरूरी है। मेला शब्द का संबंध लोगों के एक स्थान पर एकत्र होने, मिलने-जुलने और सामूहिक आयोजन से है। संस्कृत के ‘मेलक’ और ‘मिल्’ धातु से इसका संबंध बताया जाता है। सामान्य रूप से किसी धार्मिक पर्व, त्योहार या विशेष अवसर पर जब बड़ी संख्या में लोग एक स्थान पर एकत्र होते हैं, तो उसे मेला कहा जाता है।

कुंभ मेले में यह परंपरा और भी विशेष हो जाती है। यहां केवल श्रद्धालुओं का जमावड़ा नहीं होता, बल्कि विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत, महात्मा, तपस्वी, नागा संन्यासी और बैरागी भी पहुंचते हैं। धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ-हवन, प्रवचन, भजन-कीर्तन और सेवा कार्यों के माध्यम से पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र बन जाता है। यही वजह है कि धर्म ध्वजारोहण के बाद भी कुंभ मेले के पूर्ण स्वरूप को सामने आने में समय लगता है।

साधु-संतों के लिए छावनियां बनना है सबसे जरूरी तैयारी

नासिक सिंहस्थ कुंभ को भव्य स्वरूप देने के लिए प्रशासन और सरकार के सामने कई महत्वपूर्ण तैयारियां हैं। इनमें सबसे प्रमुख है देशभर से आने वाले साधु-संतों और अखाड़ों को जमीन या भूखंड उपलब्ध कराना।

अखाड़ों को जमीन मिलने के बाद वे अपनी परंपरा और क्षमता के अनुसार वहां भव्य पंडाल और छावनियां तैयार करेंगे। इन्हीं छावनियों में साधु-संतों का निवास होगा और धार्मिक गतिविधियां संचालित की जाएंगी।

इसके बाद यज्ञ, हवन, कथा, प्रवचन, भंडारे और धर्म प्रचार जैसे कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू होगा। जब अखाड़ों की छावनियां पूरी तरह सक्रिय हो जाएंगी और साधु-संतों का आगमन शुरू होगा, तभी कुंभ मेले का वास्तविक स्वरूप दिखाई देने लगेगा।

अखाड़ों में धर्म ध्वजा स्थापना से शुरू होती हैं धार्मिक गतिविधियां

कुंभ की परंपरा में अखाड़ों की धर्म ध्वजा का विशेष महत्व है। धर्म ध्वजा की स्थापना के बाद अखाड़ों में धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों की शुरुआत मानी जाती है।

इसके बाद अखाड़े अपनी परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पेशवाई निकालते हैं। पेशवाई को अखाड़ों की भव्य शोभायात्रा भी कहा जा सकता है। इसमें साधु-संत और महंत हाथी, घोड़े, रथ तथा विभिन्न प्रकार के पारंपरिक वाहनों के साथ शामिल होते हैं। कई अखाड़ों में सोने-चांदी के सिंहासन और पारंपरिक शाही साज-सज्जा भी देखने को मिलती है।

पेशवाई के माध्यम से अखाड़े अपनी धार्मिक परंपरा और शक्ति का प्रदर्शन करते हुए छावनी में प्रवेश करते हैं। इसके बाद अखाड़ों का संचालन निर्धारित परंपराओं के अनुसार शुरू होता है।

24 जुलाई को वैष्णव अखाड़ों में स्थापित होगी धर्म ध्वजा

नासिक और त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ का आयोजन दो अलग-अलग क्षेत्रों में होता है। नासिक में वैष्णव संप्रदाय के तीन प्रमुख अनी अखाड़ों की छावनियां लगती हैं। तीनों अनी अखाड़ों के राष्ट्रीय प्रवक्ता भक्ति दास महाराज के अनुसार, 24 जुलाई 2027 को सबसे पहले दिगंबर अखाड़े में धर्म ध्वजा की स्थापना होगी। इसके बाद निर्मोही और फिर निर्वाणी अखाड़े में धर्म ध्वजा स्थापित की जाएगी।

तीनों प्रमुख अनी अखाड़ों में धर्म ध्वजा स्थापना के बाद अन्य वैष्णव परंपराओं से जुड़े अखाड़ों और धार्मिक संस्थाओं में भी यह प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

इनमें चतुः संप्रदाय, तेरह भाई त्यागी, चौदह भाई त्यागी, खाकी अखाड़ा और दिगंबर परंपरा से जुड़े अन्य धार्मिक समूहों के साथ जगद्गुरु रामानंदाचार्य, वल्लभाचार्य और माधवाचार्य परंपरा की छावनियां भी शामिल हैं।

29 जुलाई 2027 को निकलेगी वैष्णव अखाड़ों की पेशवाई

धर्म ध्वजा स्थापना के बाद वैष्णव अखाड़ों की पेशवाई का कार्यक्रम भी निर्धारित किया गया है। जानकारी के अनुसार, 29 जुलाई 2027 को वैष्णव अखाड़ों की पेशवाई निकलेगी। इस दौरान अखाड़े पारंपरिक शाही अंदाज में शोभायात्रा निकालते हुए अपनी-अपनी छावनियों में प्रवेश करेंगे। इसके साथ ही अखाड़ों में धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियां तेज हो जाएंगी।

छावनियों में साधु-संतों के प्रवचन, यज्ञ-हवन, भंडारे और श्रद्धालुओं के लिए सेवा कार्य शुरू होंगे। इस तरह नासिक सिंहस्थ कुंभ का धार्मिक वातावरण धीरे-धीरे पूरी तरह तैयार होगा।

त्र्यंबकेश्वर के संन्यासी अखाड़ों में अभी तय नहीं हुई तारीख

जहां नासिक के वैष्णव अखाड़ों में धर्म ध्वजा स्थापना और पेशवाई की तारीख सामने आ चुकी है, वहीं त्र्यंबकेश्वर स्थित संन्यासी अखाड़ों में अभी इन कार्यक्रमों की तारीखों पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

त्र्यंबकेश्वर में कुल 10 प्रमुख संन्यासी अखाड़ों की धार्मिक परंपराएं हैं। यहां अलग-अलग अखाड़े अपनी परंपराओं के अनुसार धर्म ध्वजा स्थापना करते हैं।

  • जूना, आवाहन और अग्नि अखाड़े एक ही दिन धर्म ध्वजा स्थापित करते हैं।
  • निरंजनी और आनंद अखाड़े की धर्म ध्वजा स्थापना एक साथ होती है।
  • महानिर्वाणी और अटल अखाड़े भी एक साथ धर्म ध्वजा स्थापित करते हैं।
  • बड़ा उदासीन, नया उदासीन और निर्मल अखाड़े अपनी परंपरा के अनुसार एक साथ धर्म ध्वजा स्थापना करते हैं।

हालांकि, इन अखाड़ों की पेशवाई अलग-अलग निकलती है। फिलहाल धर्म ध्वजा स्थापना और पेशवाई की तारीखों को लेकर अंतिम कार्यक्रम घोषित होना बाकी है।

नासिक कुंभ को लेकर श्रद्धालुओं को समझनी होगी यह बात

31 अक्टूबर को नासिक और त्र्यंबकेश्वर में हुआ धर्म ध्वजारोहण सिंहस्थ कुंभ की धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण शुरुआत है। लेकिन इसे कुंभ मेले का औपचारिक शुभारंभ समझना सही नहीं होगा।

कुंभ मेले का वास्तविक स्वरूप अखाड़ों की छावनियों के निर्माण, धर्म ध्वजा स्थापना, पेशवाई और साधु-संतों के आगमन के बाद ही दिखाई देगा। नासिक में वैष्णव अखाड़ों के लिए 24 जुलाई 2027 को धर्म ध्वजा स्थापना और 29 जुलाई 2027 को पेशवाई की तारीख बताई गई है। वहीं त्र्यंबकेश्वर के संन्यासी अखाड़ों के कार्यक्रम की तारीखों का इंतजार है।

इसलिए सोशल मीडिया पर नासिक कुंभ मेला शुरू होने की खबरों को देखकर भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। धर्म ध्वजारोहण सिंहस्थ की तैयारियों का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जबकि कुंभ मेले का भव्य धार्मिक स्वरूप आगे की परंपराओं के साथ सामने आएगा।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .

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