धर्म संवाद / डेस्क : हिंदू धर्म में संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से कई व्रत किए जाते हैं। इन्हीं में से एक है जितिया व्रत, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत, जिउतिया या जीवितपुत्रिका के नाम से भी जाना जाता है। खासतौर पर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कई हिस्सों में इस पर्व को श्रद्धा और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जाता है।
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जितिया व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के लिए रखती हैं। इस पर्व में व्रत के साथ लोक परंपराओं, पूजा, कथा और पारंपरिक खान-पान का भी विशेष महत्व है।
जितिया व्रत कितने दिनों का होता है?
जितिया पर्व को आमतौर पर तीन दिवसीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इसके बाद मुख्य व्रत और अंत में पारण किया जाता है।
इन तीन दिनों को सामान्य रूप से इस तरह समझा जा सकता है—
- पहला दिन – नहाय-खाय: इस दिन व्रती महिलाएं स्नान करके शुद्धता के साथ भोजन ग्रहण करती हैं और व्रत की तैयारी शुरू करती हैं।
- दूसरा दिन – मुख्य जितिया व्रत: इस दिन महिलाएं संतान की लंबी आयु और मंगलमय जीवन की कामना से कठिन व्रत रखती हैं। कई परंपराओं में इस दिन निर्जला उपवास करने की मान्यता है।
- तीसरा दिन – पारण: अगले दिन विधि-विधान से पूजा करने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। इस दिन घरों में पारंपरिक व्यंजन भी बनाए जाते हैं।
जितिया व्रत में निर्जला उपवास की मान्यता
जितिया व्रत की सबसे प्रमुख विशेषता इसका कठिन स्वरूप माना जाता है। कई क्षेत्रों में व्रती महिलाएं मुख्य व्रत के दिन अन्न और जल दोनों का त्याग करती हैं। इसी वजह से इसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। हालांकि, व्रत की विधि और नियम अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों में अलग हो सकते हैं। इसलिए स्थानीय परंपरा और परिवार की मान्यता के अनुसार ही व्रत का पालन किया जाता है।
जितिया में सुनी जाती है सियार और बाज की कथा
जितिया पर्व से जुड़ी कई लोककथाएं प्रचलित हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में महिलाएं सामूहिक रूप से सियार और बाज की कथा सुनती हैं। जितिया व्रत के दौरान जिउतवाहन देवता की पूजा भी की जाती है। धार्मिक और लोक मान्यताओं में जिउतवाहन को संतान की रक्षा और दीर्घायु से जोड़ा जाता है। कथा श्रवण और पूजा के दौरान महिलाएं अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी उम्र और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
पारण के दिन बनाए जाते हैं पारंपरिक व्यंजन
जितिया के पारण का भी विशेष महत्व है। व्रत समाप्त करने के बाद कई घरों में क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग-अलग तरह के पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में करी-चावल, नोनी साग और मरुआ की रोटी जैसे व्यंजन बनाए जाने की परंपरा मिलती है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में भोजन की परंपराओं में अंतर देखा जाता है। यही क्षेत्रीय विविधता जितिया पर्व को और खास बनाती है।
बिहार और झारखंड में जितिया की परंपरा
बिहार और झारखंड में जितिया का पर्व सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। महिलाएं समूह में पूजा करती हैं, व्रत कथा सुनती हैं और पारंपरिक गीत गाती हैं। कई जगहों पर महिलाएं एक-दूसरे के साथ मिलकर पूजा और कथा का आयोजन करती हैं। इस दौरान जिउतिया धागा धारण करने की भी परंपरा है। बिहार के मिथिला, मगध और भोजपुरी क्षेत्रों में जितिया से जुड़ी रस्मों और खान-पान में स्थानीय संस्कृति के अनुसार अंतर देखने को मिलता है।
उत्तर प्रदेश में भी खास है जितिया पर्व
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार से सटे इलाकों में जितिया व्रत विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यहां भी माताएं संतान की लंबी उम्र और स्वास्थ्य के लिए व्रत रखती हैं। पूजा के दौरान लोककथाएं सुनने और जिउतवाहन देवता की आराधना की परंपरा कई परिवारों में आज भी निभाई जाती है।
नेपाल में भी मनाया जाता है जितिया
भारत के अलावा नेपाल में भी जितिया पर्व का विशेष महत्व है। खासतौर पर मिथिला, भोजपुर और तराई क्षेत्र की महिलाओं के बीच यह पर्व लोकप्रिय है। थारू और मधेसी समुदाय की महिलाएं भी इसे अपनी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाती हैं। नेपाल में भी कई महिलाएं जितिया के अवसर पर संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना से उपवास करती हैं।
थारू समुदाय में जितिया की खास परंपरा
नेपाल के तराई क्षेत्र में रहने वाली थारू महिलाओं के बीच जितिया से जुड़ी कुछ विशिष्ट लोक परंपराएं देखने को मिलती हैं। कुछ समुदायों में व्रत से पहले पारंपरिक भोजन करने की परंपरा है। थारू समुदाय में झमटा नामक पारंपरिक नृत्य भी जितिया पर्व से जुड़ा हुआ है। इस तरह धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति और सामुदायिक परंपराएं भी इस पर्व का हिस्सा बनती हैं।
जितिया में दिखती है भारत-नेपाल की सांस्कृतिक समानता
जितिया पर्व की सबसे खास बात यह है कि भारत और नेपाल के अलग-अलग क्षेत्रों में इसे मनाने की विधि में कुछ अंतर होने के बावजूद इसकी मूल भावना समान है। मां अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करती है। पूजा, व्रत, कथा, लोकगीत और पारंपरिक भोजन इस पर्व को धार्मिक होने के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक पर्व भी बनाते हैं।
जितिया व्रत का महत्व
जितिया केवल एक उपवास नहीं, बल्कि मां और संतान के भावनात्मक रिश्ते से जुड़ा पर्व है। माताएं अपनी संतान के मंगल और दीर्घायु की कामना से कठिन व्रत करती हैं। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के विभिन्न समुदायों में इसकी अलग-अलग लोक परंपराएं देखने को मिलती हैं। यही विविधता जितिया को भारतीय उपमहाद्वीप की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ती है।






