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Jagannath Rath Yatra 2026: क्यों पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से साफ करते हैं भगवान का रथ?

By Tami

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धर्म संवाद / डेस्क : विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 आज से भक्ति और श्रद्धा के माहौल में शुरू हो गई है। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र यह महापर्व केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि लगभग एक महीने तक चलने वाला धार्मिक उत्सव है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने भक्तों के बीच विराजमान होते हैं और उन्हें दर्शन देते हैं।

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रथ यात्रा की शुरुआत स्नान पूर्णिमा से होती है और इसका समापन नीलाद्रि बिजै के साथ होता है। बीच में भगवान की वापसी यात्रा को ‘बहुदा यात्रा’ कहा जाता है, जो इस उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्या है ‘छेरा पहरा’ की परंपरा?

जगन्नाथ रथ यात्रा की सबसे खास और अनोखी परंपराओं में से एक है ‘छेरा पहरा’। इस रस्म के दौरान पुरी के गजपति महाराज स्वयं सोने की मूठ वाली झाड़ू से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथ तथा रथ मार्ग की सफाई करते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सेवा, विनम्रता और समानता का संदेश देती है। इसका अर्थ है कि भगवान के सामने सभी समान हैं। चाहे कोई राजा हो या सामान्य व्यक्ति, सभी भगवान के सेवक हैं।

सोने की झाड़ू का क्या है धार्मिक महत्व?

सनातन परंपरा में सोने को शुद्धता, समृद्धि और देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। वहीं झाड़ू को भी माता लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है, जो न केवल गंदगी बल्कि नकारात्मक ऊर्जा को भी दूर करने का प्रतीक है।

इसी वजह से भगवान के रथ और मार्ग को सोने की झाड़ू से साफ करना उनके स्वागत, सम्मान और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। सदियों से पुरी के राजपरिवार द्वारा इस परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है।

भगवान के सामने सब समान

‘छेरा पहरा’ का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भगवान किसी में भेदभाव नहीं करते। गजपति महाराज स्वयं झाड़ू लगाकर यह दर्शाते हैं कि ईश्वर की दृष्टि में न कोई राजा बड़ा है और न कोई साधारण व्यक्ति छोटा। सभी उनके समान भक्त हैं। यही कारण है कि रथ यात्रा को सेवा, समर्पण और समानता का महापर्व भी कहा जाता है।

कौन हैं पुरी के वर्तमान गजपति महाराज?

पुरी के वर्तमान गजपति महाराज दिव्यसिंह देव चतुर्थ हैं। वे भोई राजवंश के वर्तमान प्रमुख हैं। हालांकि ‘गजपति’ उपाधि का इतिहास 12वीं शताब्दी के पूर्वी गंग वंश से जुड़ा माना जाता है, जिसका भगवान जगन्नाथ मंदिर से गहरा संबंध रहा है। दिव्यसिंह देव, गजपति महाराज बीरकिशोर देव के पुत्र हैं। वर्ष 1970 में अपने पिता के निधन के बाद मात्र 17 वर्ष की आयु में उन्होंने गजपति की उपाधि संभाली। आज भी वे जगन्नाथ मंदिर की परंपराओं और धार्मिक अनुष्ठानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

रथ यात्रा का आध्यात्मिक संदेश

जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समानता, सेवा, विनम्रता और मानवता का संदेश देने वाला महापर्व है। ‘छेरा पहरा’ जैसी परंपरा यह सिखाती है कि सत्ता, पद और प्रतिष्ठा से ऊपर सेवा और समर्पण का स्थान है। यही कारण है कि यह परंपरा सदियों बाद भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था और प्रेरणा का केंद्र बनी हुई है।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .

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