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भगवान जगन्नाथ ने आखिर क्यों एकादशी को उल्टा लटका दिया था? जानें रहस्यमयी कथा

By Tami

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Ekadashi is hanging upside down! (1)

धर्म संवाद / डेस्क : भारत के सबसे पवित्र और रहस्यमयी तीर्थस्थलों में से एक पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं और चमत्कारों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन मात्र से व्यक्ति के जीवन की दशा और दिशा दोनों बदल सकती हैं। यहां तक कि कई श्रद्धालु मानते हैं कि भगवान की कृपा से ग्रहों की प्रतिकूल स्थिति भी अनुकूल होने लगती है।

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इन्हीं रहस्यों में से एक है जगन्नाथ पुरी की “उल्टी एकादशी”, जिसके बारे में सुनकर अधिकांश लोग हैरान रह जाते हैं। जहां पूरे भारत में एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित माना जाता है, वहीं पुरी जगन्नाथ धाम में इस दिन भगवान को चावल का भोग लगाया जाता है और भक्त भी महाप्रसाद के रूप में चावल ग्रहण करते हैं। आखिर इसके पीछे क्या रहस्य है? आइए जानते हैं।

जगन्नाथ पुरी में एकादशी पर चावल खाने की अनोखी परंपरा

हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और व्रत रखने वाले लोग अनाज, विशेष रूप से चावल का सेवन नहीं करते।

लेकिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर में यह परंपरा बिल्कुल अलग है। यहां एकादशी के दिन भगवान जगन्नाथ को चावल सहित महाप्रसाद अर्पित किया जाता है और श्रद्धालुओं में भी वही प्रसाद वितरित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जगन्नाथ महाप्रसाद पर किसी भी व्रत, तिथि या नियम का बंधन नहीं माना जाता।

क्या है ‘उल्टी एकादशी’ की पौराणिक कथा?

लोकमान्यताओं के अनुसार, एक बार सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद ग्रहण करने के लिए पुरी पहुंचे। जब वे मंदिर पहुंचे, तब तक महाप्रसाद समाप्त हो चुका था। केवल एक पत्तल पर कुछ चावल के दाने बचे थे, जिन्हें एक कुत्ता खा रहा था। भगवान जगन्नाथ के प्रति अपनी अटूट भक्ति और श्रद्धा के कारण ब्रह्मा जी ने बिना किसी संकोच के उसी प्रसाद को ग्रहण करना शुरू कर दिया।

इसी दौरान एकादशी देवी वहां प्रकट हुईं और उन्होंने कहा कि आज एकादशी है और चावल का सेवन व्रत के नियमों के विरुद्ध है। तभी भगवान जगन्नाथ स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि जहां सच्ची भक्ति और श्रद्धा होती है, वहां नियम और प्रतिबंध गौण हो जाते हैं। भगवान ने घोषणा की कि उनके महाप्रसाद पर किसी भी तिथि या व्रत का बंधन लागू नहीं होगा।

लोककथाओं के अनुसार, इसी घटना के बाद भगवान ने एकादशी देवी को मंदिर के पीछे उल्टा लटका दिया। इसी कारण इस परंपरा को “उल्टी एकादशी” कहा जाता है।

क्या वास्तव में मंदिर में एकादशी उल्टी लटकी हुई है?

धार्मिक मान्यताओं और लोककथाओं में इस कथा का विशेष महत्व है। हालांकि, इसे ऐतिहासिक या वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि यह भगवान जगन्नाथ की भक्ति और महाप्रसाद की महिमा को दर्शाने वाली एक धार्मिक परंपरा और आस्था का प्रतीक है।

जगन्नाथ महाप्रसाद की क्या है विशेषता?

जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि भगवान को अर्पित होने के बाद यह केवल भोजन नहीं बल्कि दिव्य प्रसाद बन जाता है।

महाप्रसाद से जुड़ी कुछ विशेष मान्यताएं:

  • महाप्रसाद को अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ ग्रहण किया जाता है।
  • इसे भगवान की कृपा और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
  • पारंपरिक रूप से महाप्रसाद बैठकर ग्रहण करने की परंपरा है।
  • महाप्रसाद को सभी जाति और वर्ग के लोग समान रूप से ग्रहण कर सकते हैं।

जगन्नाथ पुरी की यह परंपरा क्या संदेश देती है?

उल्टी एकादशी की कथा यह संदेश देती है कि भगवान के लिए सबसे महत्वपूर्ण भक्त की सच्ची श्रद्धा और भक्ति होती है। नियम और परंपराएं धर्म का हिस्सा हैं, लेकिन भक्ति और समर्पण को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।

इसी वजह से आज भी हजारों श्रद्धालु एकादशी के दिन पुरी जगन्नाथ धाम में महाप्रसाद के रूप में चावल ग्रहण करते हैं और इसे भगवान का विशेष आशीर्वाद मानते हैं।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .

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