धर्म संवाद / डेस्क : भगवान गणेश को हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से करने की परंपरा है। गणपति बप्पा की आराधना में दूर्वा, मोदक, फल और फूल जैसी कई चीजें अर्पित की जाती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान गणेश की पूजा में तुलसी दल चढ़ाना वर्जित माना जाता है?
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गणेश चतुर्थी के अवसर पर जब घर-घर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है, तब पूजा से जुड़े कई नियमों का पालन किया जाता है। इन्हीं में से एक नियम तुलसी दल से जुड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसके पीछे भगवान गणेश और देवी तुलसी से जुड़ी एक पौराणिक कथा बताई जाती है।
इस वर्ष गणेश चतुर्थी 14 सितंबर 2026, सोमवार को मनाई जाएगी। ऐसे में आइए जानते हैं कि गणपति पूजा में तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा प्रचलित है।
गणेश चतुर्थी 2026 कब है?
वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 14 सितंबर 2026 को सुबह 7 बजकर 6 मिनट से शुरू होगी और 15 सितंबर 2026 को सुबह 7 बजकर 44 मिनट तक रहेगी।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश का जन्म चतुर्थी तिथि के मध्याह्न काल में हुआ था। इसलिए इस वर्ष गणेश चतुर्थी का मुख्य पर्व 14 सितंबर को मनाया जाएगा। गणेश चतुर्थी के दिन भक्त भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर प्राण-प्रतिष्ठा और विधि-विधान से पूजा करते हैं। इसके बाद अपनी परंपरा के अनुसार कुछ दिनों तक गणपति की आराधना करने के बाद प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
गणेश पूजा में तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश को तुलसी अर्पित नहीं की जाती। इसके पीछे गणेश जी और देवी तुलसी से जुड़ी एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार, एक बार भगवान गणेश गहन ध्यान और तपस्या में लीन थे। उसी दौरान देवी तुलसी वहां से गुजरीं। मान्यता है कि भगवान गणेश के तेजस्वी और सुंदर स्वरूप को देखकर तुलसी उनसे प्रभावित हो गईं।
इसके बाद उन्होंने भगवान गणेश के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। लेकिन भगवान गणेश ने उनका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। उन्होंने विवाह से इनकार कर दिया। कथा के अनुसार, इससे देवी तुलसी क्रोधित हो गईं और उन्होंने भगवान गणेश को श्राप दिया कि उनका विवाह दो स्त्रियों से होगा।
भगवान गणेश ने भी तुलसी को दिया श्राप
पौराणिक कथा में आगे बताया जाता है कि देवी तुलसी के श्राप से भगवान गणेश भी क्रोधित हो गए। उन्होंने देवी तुलसी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर से होगा।
अपने क्रोध का परिणाम समझने के बाद देवी तुलसी ने भगवान गणेश से क्षमा मांगी। तब भगवान गणेश ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि वह भगवान विष्णु की प्रिय होंगी और धार्मिक दृष्टि से उनका विशेष महत्व रहेगा। इसी कथा के आधार पर धार्मिक परंपरा में यह मान्यता प्रचलित हुई कि भगवान गणेश की पूजा में तुलसी दल अर्पित नहीं किया जाना चाहिए।
भगवान गणेश की पूजा में क्या चढ़ाएं?
गणपति पूजा में तुलसी के स्थान पर कई अन्य पूजन सामग्रियों का विशेष महत्व बताया गया है। इनमें दूर्वा घास को भगवान गणेश का अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसके अलावा भक्त भगवान गणेश को मोदक, लड्डू, फल, फूल और अन्य नैवेद्य अर्पित करते हैं। पूजा के दौरान गणेश मंत्रों का जाप और आरती भी की जाती है।
विशेष रूप से गणेश चतुर्थी के दिन भक्त श्रद्धा के साथ भगवान गणेश का पूजन कर उनसे बुद्धि, विवेक, सुख-समृद्धि और जीवन के विघ्न दूर करने की प्रार्थना करते हैं।
क्या तुलसी हर भगवान को चढ़ाई जाती है?
तुलसी हिंदू धार्मिक परंपरा में अत्यंत पवित्र मानी जाती है और विशेष रूप से भगवान विष्णु एवं उनके स्वरूपों की पूजा में इसका महत्व बताया गया है। लेकिन हर देवी-देवता की पूजा में एक जैसी सामग्री का प्रयोग नहीं होता। इसी वजह से अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा पद्धति में अलग-अलग पूजन सामग्री का महत्व बताया गया है। गणेश जी के संदर्भ में तुलसी अर्पित न करने की परंपरा भी इसी धार्मिक मान्यता और पौराणिक कथा से जुड़ी मानी जाती है।
गणेश चतुर्थी पर रखें इन बातों का ध्यान
गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा करते समय भक्त अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार पूजा विधि अपनाते हैं। सामान्य तौर पर भगवान गणेश को दूर्वा, मोदक, फूल, फल और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा में श्रद्धा और शुद्ध भाव को विशेष महत्व दिया जाता है। इसलिए किसी भी पूजा विधि को लेकर अलग-अलग परंपराएं हों तो स्थानीय पुरोहित या अपने परिवार की परंपरा का पालन करना उचित माना जाता है।
