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दुर्गा सप्तशती पाठ विधि: नवरात्रि में कैसे करें पाठ? जानें 13 अध्याय, मंत्र और नियम

By Tami

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Durga Saptashati Path

धर्म संवाद / डेस्क : शारदीय नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की आराधना और साधना के लिए बेहद खास माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा करते हैं। मंदिरों से लेकर घरों तक देवी मंत्रों की गूंज सुनाई देती है और श्रद्धालु सुख-समृद्धि, साहस तथा परिवार की खुशहाली के लिए माता रानी से प्रार्थना करते हैं। नवरात्रि के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ करना भी विशेष धार्मिक महत्व रखता है।

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दुर्गा सप्तशती का पाठ मां दुर्गा की महिमा का स्मरण करने, मन को एकाग्र करने और नकारात्मक विचारों से दूर रहने की प्रेरणा देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुर्गा सप्तशती में कुल कितने अध्याय हैं? इसका पाठ शुरू करने से पहले किन नियमों का पालन करना चाहिए और कौन-से मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है?

आइए जानते हैं दुर्गा सप्तशती पाठ की विधि, 13 अध्यायों का महत्व, प्रमुख देवी मंत्र और पाठ के दौरान ध्यान रखने वाले जरूरी नियम।

दुर्गा सप्तशती क्या है? जानें धार्मिक महत्व

दुर्गा सप्तशती को देवी माहात्म्य और चंडी पाठ के नाम से भी जाना जाता है। यह मार्कण्डेय पुराण का एक महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें देवी दुर्गा की महिमा, दैत्य शक्तियों के साथ उनके युद्ध और धर्म की स्थापना का वर्णन मिलता है। इस ग्रंथ में 13 अध्याय और परंपरागत गणना के अनुसार 700 श्लोक हैं। इसी वजह से इसे सप्तशती कहा जाता है। इसमें मां दुर्गा के महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती से संबंधित तीन प्रमुख चरित्रों का वर्णन मिलता है।

दुर्गा सप्तशती की कथाओं में मधु-कैटभ, महिषासुर, धूम्रलोचन, चंड-मुंड, रक्तबीज, शुंभ और निशुंभ जैसे असुरों के वध का वर्णन किया गया है। इन कथाओं को बुराई पर अच्छाई की विजय और देवी शक्ति की महिमा के रूप में देखा जाता है।

नवरात्रि में श्रद्धालु दुर्गा सप्तशती का पाठ करके मां दुर्गा के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करते हैं। हालांकि, पाठ से जुड़े आध्यात्मिक लाभ धार्मिक आस्था और परंपराओं पर आधारित हैं।

दुर्गा सप्तशती का पाठ कैसे करें? जानें पूरी विधि

दुर्गा सप्तशती का पाठ अपनी श्रद्धा, समय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार किया जा सकता है। यदि आप नवरात्रि में घर पर पाठ करना चाहते हैं, तो सामान्य रूप से निम्न विधि अपना सकते हैं।

1. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें

सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थल को साफ करें और शांत वातावरण में बैठने की व्यवस्था करें। कई परंपराओं में लाल वस्त्र को देवी उपासना के लिए शुभ माना जाता है।

2. मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें

पूजा स्थल पर चौकी रखकर उस पर स्वच्छ लाल या अन्य साफ वस्त्र बिछाएं। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। देवी के सामने दीपक जलाएं और अपनी श्रद्धा के अनुसार पुष्प, अक्षत, कुमकुम तथा नैवेद्य अर्पित करें।

3. संकल्प लेकर करें देवी का ध्यान

पाठ शुरू करने से पहले मां दुर्गा का ध्यान करें और अपनी श्रद्धा के अनुसार संकल्प लें। इसके बाद गणेश वंदना और देवी की प्रार्थना करके पाठ आरंभ कर सकते हैं।

4. दुर्गा कवच और प्रारंभिक पाठ करें

पारंपरिक चंडी पाठ की विधि में दुर्गा कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र का पाठ किया जाता है। इसके बाद निर्धारित परंपरा के अनुसार देवी माहात्म्य के अध्याय पढ़े जाते हैं।

ध्यान रखें कि दुर्गा सप्तशती के पाठ की विस्तृत विधि अलग-अलग संप्रदायों और पूजा परंपराओं में भिन्न हो सकती है। इसलिए पूर्ण विधि से अनुष्ठान करने के इच्छुक श्रद्धालु किसी जानकार पुरोहित या अपनी परंपरा की प्रमाणिक पाठ-पुस्तिका का मार्गदर्शन ले सकते हैं।

5. पाठ के बाद आरती और प्रसाद अर्पित करें

पाठ पूरा होने के बाद मां दुर्गा की आरती करें। देवी को फल, मिठाई, बताशे या अपनी परंपरा के अनुसार अन्य प्रसाद अर्पित कर सकते हैं। अंत में पूजा में हुई किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थना करें और परिवार की सुख-शांति की कामना करें।

दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों में क्या वर्णित है?

दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों को तीन प्रमुख चरित्रों में बांटा गया है। इनमें देवी की विभिन्न लीलाओं, असुरों के साथ युद्ध और देवताओं द्वारा की गई स्तुति का वर्णन मिलता है।

अध्यायप्रमुख विषय
पहला अध्यायमधु-कैटभ वध की कथा
दूसरा अध्यायमहिषासुर की सेना के साथ देवी का युद्ध
तीसरा अध्यायमहिषासुर का वध
चौथा अध्यायदेवताओं द्वारा देवी की स्तुति
पांचवां अध्यायशुंभ-निशुंभ के प्रसंग की शुरुआत और देवी की स्तुति
छठा अध्यायधूम्रलोचन वध
सातवां अध्यायचंड-मुंड वध
आठवां अध्यायरक्तबीज वध
नौवां अध्यायनिशुंभ के साथ युद्ध का वर्णन
दसवां अध्यायशुंभ वध
ग्यारहवां अध्यायनारायणी स्तुति और देवी की महिमा
बारहवां अध्यायदेवी माहात्म्य के पाठ का फल और देवी की महिमा
तेरहवां अध्यायराजा सुरथ और वैश्य समाधि की कथा तथा देवी से वरदान

इन अध्यायों में देवी की शक्ति और महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। पाठ के दौरान कथा के अर्थ को समझना भी उपयोगी है, क्योंकि इससे साधक को धार्मिक प्रसंगों और उनके प्रतीकात्मक संदेशों को जानने का अवसर मिलता है।

दुर्गा सप्तशती के तीन चरित्र कौन-से हैं?

दुर्गा सप्तशती के 13 अध्याय तीन प्रमुख चरित्रों में विभाजित हैं। इनका संबंध देवी शक्ति के अलग-अलग स्वरूपों से माना जाता है।

1. प्रथम चरित्र — महाकाली

प्रथम चरित्र में पहले अध्याय की कथा आती है। इसमें मधु-कैटभ के वध और देवी की शक्ति का वर्णन है।

2. मध्यम चरित्र — महालक्ष्मी

मध्यम चरित्र में दूसरे से चौथे अध्याय तक के प्रसंग आते हैं। इसमें महिषासुर के साथ देवी का युद्ध, उसके वध और देवताओं द्वारा देवी की स्तुति का वर्णन है।

3. उत्तर चरित्र — महासरस्वती

उत्तर चरित्र में पांचवें से तेरहवें अध्याय तक के प्रसंग शामिल हैं। इसमें शुंभ-निशुंभ और अन्य असुरों के साथ देवी के युद्ध, देवताओं की स्तुति तथा राजा सुरथ और वैश्य समाधि की कथा का वर्णन मिलता है। ये तीनों चरित्र देवी की महिमा और शक्ति के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखते हैं।

दुर्गा सप्तशती के प्रमुख मंत्र और उनका महत्व

दुर्गा सप्तशती में देवी की स्तुति करने वाले अनेक मंत्र और श्लोक हैं। भक्त नवरात्रि के दौरान इनका पाठ अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार करते हैं।

1. सर्वमंगल मांगल्ये मंत्र

मंत्र:

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

इस मंत्र में मां नारायणी की स्तुति की गई है। भक्त इसे शुभता, कल्याण और देवी के प्रति समर्पण की भावना से पढ़ते हैं।

2. जयन्ती मंगला काली मंत्र

मंत्र:

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥

इस श्लोक में देवी के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण किया गया है। नवरात्रि में इसे देवी स्तुति के रूप में पढ़ने की परंपरा है।

3. शूलेन पाहि नो देवि मंत्र

मंत्र:

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।

घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥

यह श्लोक मां दुर्गा से रक्षा और संकटों से बचाव की प्रार्थना करता है। भक्त इसे देवी की शक्ति का स्मरण करते हुए पढ़ते हैं।

4. सर्वाबाधा प्रशमनं मंत्र

मंत्र:

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।

एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥

इस श्लोक में देवी से बाधाओं को दूर करने और शत्रुता का अंत करने की प्रार्थना की गई है। इसका पाठ देवी माहात्म्य की परंपरा में महत्वपूर्ण माना जाता है।

5. सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो मंत्र

मंत्र:

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।

मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥

यह श्लोक देवी की कृपा से बाधाओं से मुक्ति, धन-धान्य और परिवार के कल्याण की कामना से जुड़ा है। इसके पाठ का धार्मिक महत्व देवी की कृपा में श्रद्धा रखने से संबंधित है।

ध्यान दें: मंत्रों का पाठ करते समय किसी प्रमाणिक दुर्गा सप्तशती पुस्तक से शुद्ध पाठ और संदर्भ की पुष्टि करें। संस्कृत के उच्चारण और पाठ-विधि में सहायता के लिए जानकार व्यक्ति का मार्गदर्शन लिया जा सकता है।

नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ एक दिन में करें या नौ दिनों में?

दुर्गा सप्तशती का पाठ भक्त अपनी सुविधा और पूजा की परंपरा के अनुसार एक दिन में या कई दिनों में पूरा कर सकते हैं। नवरात्रि के दौरान नौ दिनों में पाठ करने की परंपरा भी प्रचलित है।

यदि आपके पास पर्याप्त समय है, तो आप अपनी पाठ-पुस्तिका में दिए गए पारंपरिक विभाजन के अनुसार प्रतिदिन कुछ अध्याय पढ़ सकते हैं। वहीं, विशेष अनुष्ठान के लिए त्र्यंगम, नवांगम या अन्य पाठ-विधियों का उल्लेख मिलता है। इन विधियों में पाठ के अलग-अलग अंगों और अध्यायों का क्रम निर्धारित हो सकता है।

इन नामों के अंतर्गत पालन की जाने वाली विधि परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती है। इसलिए इन्हें अपनाने से पहले प्रमाणिक पाठ-विधि का अनुसरण करें। केवल जल्दी पाठ पूरा करने के बजाय शुद्ध उच्चारण, एकाग्रता और श्रद्धा पर ध्यान देना अधिक उपयोगी है।

दुर्गा सप्तशती पाठ के दौरान किन नियमों का ध्यान रखें?

नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय भक्त अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार कुछ नियमों का पालन करते हैं।

  • स्वच्छता: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को साफ रखें।
  • पाठ-पुस्तक का सम्मान: दुर्गा सप्तशती की पुस्तक को स्वच्छ स्थान या चौकी पर रखें।
  • एकाग्रता: पाठ के दौरान मन शांत रखें और अनावश्यक बातचीत से बचें।
  • खानपान: कई भक्त नवरात्रि में सात्विक भोजन करते हैं और अपनी परंपरा के अनुसार मांसाहार तथा मदिरा से परहेज करते हैं।
  • संयम: कुछ धार्मिक परंपराओं में साधना के दौरान ब्रह्मचर्य और इंद्रिय संयम का पालन किया जाता है।
  • सद्भाव: किसी के प्रति द्वेष या दुर्भावना न रखें। पूजा के साथ करुणा, विनम्रता और सदाचार अपनाने का प्रयास करें।

इन नियमों का पालन अलग-अलग परिवारों और धार्मिक परंपराओं में अलग रूप में किया जा सकता है। यदि आप किसी विशेष अनुष्ठान का संकल्प लेते हैं, तो उसकी निर्धारित विधि का पालन करें।

दुर्गा सप्तशती पाठ करने का क्या महत्व है?

धार्मिक मान्यताओं में दुर्गा सप्तशती का पाठ देवी की कृपा प्राप्त करने, भय और चिंता के समय आध्यात्मिक संबल पाने तथा मन को एकाग्र करने से जोड़ा जाता है। नवरात्रि में इसका पाठ विशेष रूप से प्रचलित है।

इस ग्रंथ की कथाएं भक्तों को साहस, धैर्य और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देती हैं। देवी के विभिन्न स्वरूप शक्ति, करुणा और धर्म की स्थापना के प्रतीक माने जाते हैं।

हालांकि, किसी विशेष मंत्र या पाठ से हर समस्या का समाधान निश्चित रूप से हो जाएगा, ऐसा दावा नहीं किया जा सकता। इसका महत्व मुख्य रूप से धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक अभ्यास और देवी की महिमा के स्मरण में है।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .

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