धर्म संवाद / डेस्क : सनातन धर्म में श्रीमद्भगवद् गीता का अत्यंत विशेष महत्व है। मान्यता है कि जो साधक पूर्ण श्रद्धा, नियमित साधना और सच्चे मन से प्रतिदिन गीता का पाठ करता है, उसे जीवन के वास्तविक उद्देश्य की समझ प्राप्त होती है। गीता के पाठ के माध्यम से ज्ञान की प्राप्ति चार चरणों में होती है श्रवण या पठन ज्ञान, मनन ज्ञान, निदिध्यासन ज्ञान और अनुभव ज्ञान। इन चारों स्तरों से गुजरने पर ही ज्ञान पूर्ण होता है और उसका वास्तविक लाभ प्राप्त होता है।
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अर्थात, पहले ज्ञान को पढ़ना या सुनना, फिर उस पर विचार करना और अंत में उसे जीवन में उतारना ।इसी प्रक्रिया से ज्ञान फलित होता है और साधक को उसके परिणाम मिलने लगते हैं। आइए, अब जानते हैं श्रीमद्भगवद् गीता की आरती।
जय भगवद् गीते, जय भगवद् गीते ।
हरि-हिय-कमल-विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते ॥
कर्म-सुमर्म-प्रकाशिनि, कामासक्तिहरा ।
तत्त्वज्ञान-विकाशिनि, विद्या ब्रह्म परा
॥ जय भगवद् गीते…॥
निश्चल-भक्ति-विधायिनि, निर्मल मलहारी ।
शरण-सहस्य-प्रदायिनि, सब विधि सुखकारी
॥ जय भगवद् गीते…॥
राग-द्वेष-विदारिणि, कारिणि मोद सदा ।
भव-भय-हारिणि, तारिणि परमानन्दप्रदा
॥ जय भगवद् गीते…॥
आसुर-भाव-विनाशिनि, नाशिनि तम रजनी ।
दैवी सद् गुणदायिनि, हरि-रसिका सजनी
॥ जय भगवद् गीते…॥
समता, त्याग सिखावनि, हरि-मुख की बानी ।
सकल शास्त्र की स्वामिनी, श्रुतियों की रानी
॥ जय भगवद् गीते…॥
दया-सुधा बरसावनि, मातु! कृपा कीजै ।
हरिपद-प्रेम दान कर, अपनो कर लीजै
॥ जय भगवद् गीते…॥
जय भगवद् गीते, जय भगवद् गीते ।
हरि-हिय-कमल-विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते ॥






