दक्षिण भारत में गणेश चतुर्थी कैसे मनाते हैं? जानें गौरी हब्बा की परंपरा

By Tami

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Gauri Habba

धर्म संवाद / डेस्क : भारतीय संस्कृति में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य, बुद्धि-विवेक के देवता, मंगलकर्ता और विघ्नहर्ता माना जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला गणेश चतुर्थी पर्व पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी 14 सितंबर 2026, सोमवार को मनाई जाएगी।

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महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की भव्यता दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन दक्षिण भारत में भी गणेश चतुर्थी की अपनी अनूठी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं। खासतौर पर कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में गणेश चतुर्थी से पहले माता गौरी की पूजा की जाती है। यहां यह पर्व केवल भगवान गणेश के स्वागत तक सीमित नहीं है, बल्कि माता गौरी और भगवान गणेश के पवित्र संबंध, परिवार की सुख-समृद्धि और प्रकृति से जुड़ाव का भी प्रतीक माना जाता है। आइए जानते हैं कि दक्षिण भारत में गणेश चतुर्थी किस तरह मनाई जाती है और यहां की प्रमुख परंपराएं क्या हैं।

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दक्षिण भारत में गणेश चतुर्थी से पहले होती है गौरी पूजा

दक्षिण भारत के कई हिस्सों, विशेषकर कर्नाटक में गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले ‘गौरी हब्बा’ मनाने की परंपरा है। यह पर्व माता गौरी यानी देवी पार्वती को समर्पित होता है। मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को देवी गौरी का स्वागत किया जाता है और इसके अगले दिन उनके पुत्र भगवान गणेश का आगमन होता है। इस वजह से दोनों पर्वों को मां और पुत्र के पवित्र संबंध से जोड़कर देखा जाता है।

गौरी हब्बा के अवसर पर महिलाएं माता गौरी की पूजा कर परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और मंगलकामना करती हैं। कई घरों में इस दिन विशेष सजावट और पारंपरिक पूजा का आयोजन किया जाता है।

हल्दी से बनाई जाती है अरिशिनादगौरी की प्रतिमा

कर्नाटक की पारंपरिक पूजा पद्धति में ‘अरिशिनादगौरी’ का विशेष महत्व है। ‘अरिशिना’ का अर्थ हल्दी होता है। इस परंपरा में हल्दी से देवी गौरी की छोटी प्रतिमा तैयार की जाती है और विधि-विधान से उनकी पूजा की जाती है।

महिलाएं इस अवसर पर पारंपरिक वस्त्र धारण करती हैं और माता गौरी को फूल, फल तथा अन्य पूजन सामग्री अर्पित करती हैं। कई स्थानों पर गौरी प्रतिमा को आम के पत्तों और फूलों से सजाया जाता है। इस परंपरा का संबंध देवी गौरी के सौभाग्य, शक्ति, समृद्धि और मातृत्व के स्वरूप से जोड़ा जाता है।

अगले दिन होता है भगवान गणेश का स्वागत

गौरी पूजा के अगले दिन भगवान गणेश की स्थापना की जाती है। घरों और मंदिरों में भक्त गणपति बप्पा की प्रतिमा लाकर विधि-विधान से उनकी पूजा करते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश माता पार्वती और भगवान शिव के पुत्र हैं। उन्हें विघ्नों को दूर करने वाला और शुभ कार्यों को सफल बनाने वाला देवता माना जाता है। यही कारण है कि हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से करने की परंपरा है। गणेश चतुर्थी के दिन प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा, गणेश पूजन और आरती के साथ उत्सव की शुरुआत होती है।

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दक्षिण भारत में इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं का महत्व

दक्षिण भारत में गणेश चतुर्थी के दौरान कई घरों और मंदिरों में मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाएं स्थापित करने की परंपरा देखने को मिलती है। प्राकृतिक सामग्री से बनी प्रतिमाओं को पर्यावरण के अनुकूल माना जाता है। पूजा के दौरान भगवान गणेश को फूल, दूर्वा, फल और विभिन्न प्रकार के नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। वैदिक मंत्रों और पारंपरिक पूजा विधियों के साथ गणपति की आराधना की जाती है।

कोझुकट्टई से लेकर मोदक तक लगता है भोग

भगवान गणेश को मोदक बेहद प्रिय माना जाता है। इसलिए गणेश चतुर्थी पर देश के अलग-अलग हिस्सों में गणपति को विभिन्न प्रकार के पकवानों का भोग लगाया जाता है। दक्षिण भारत में तमिलनाडु का कोझुकट्टई विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसे चावल के आटे से तैयार किया जाता है और इसमें नारियल तथा गुड़ का इस्तेमाल किया जाता है।

इसके अलावा कई जगहों पर मोदक, वड़ा, पायसम और अन्य पारंपरिक व्यंजन भी भगवान गणेश को अर्पित किए जाते हैं। घरों में परिवार के सदस्य मिलकर इन पकवानों को तैयार करते हैं।

दक्षिण भारत में भी सजते हैं गणेश उत्सव के पंडाल

समय के साथ दक्षिण भारत के शहरों और कस्बों में भी सार्वजनिक रूप से गणेश उत्सव के पंडाल सजाने की परंपरा लोकप्रिय हुई है। स्थानीय समितियां भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर कई दिनों तक पूजा, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं।

हालांकि, कई परिवार आज भी घर में गणेश प्रतिमा स्थापित करके एक, तीन या पांच दिनों तक पूजा करते हैं। इसके बाद श्रद्धा और विधि के अनुसार गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

नदी और समुद्र में होता है गणेश प्रतिमा का विसर्जन

गणेशोत्सव के अंतिम दिन भक्त भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन करते हैं। दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में स्थानीय नदियों, तालाबों या समुद्र में विसर्जन की परंपरा है। विसर्जन के दौरान भक्त गणपति बप्पा से परिवार की सुख-समृद्धि और सभी विघ्नों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। श्रद्धालु अगले वर्ष फिर से भगवान गणेश के आगमन की कामना करते हुए उन्हें विदाई देते हैं।

दक्षिण भारत की गणेश चतुर्थी क्यों है खास?

दक्षिण भारत में गणेश चतुर्थी की खासियत यह है कि यहां भगवान गणेश की पूजा के साथ माता गौरी की आराधना को भी विशेष महत्व दिया जाता है। गौरी हब्बा और गणेश चतुर्थी का क्रम मां और पुत्र के धार्मिक संबंध को दर्शाता है। यह पर्व परिवार, परंपरा, प्रकृति और भक्ति को एक साथ जोड़ता है। यही वजह है कि दक्षिण भारत में गणेश चतुर्थी केवल धार्मिक उत्सव ही नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाला सांस्कृतिक पर्व भी बन जाता है।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .