प्रभु जगन्नाथ का रथ क्यों रुकता है एक मुस्लिम व्यक्ति के मजार में

By Tami

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प्रभु जगन्नाथ का रथ क्यों रुकता है एक मुस्लिम व्यक्ति के मजार में

धर्म संवाद / डेस्क : हर साल भगवान जगन्नाथ अपने रथ नंदीघोष पर सवार होकर अपने भक्तों के बीच आते हैं फिर अपने मौसी के घर गुंडीचा मंदिर जाते हैं। हिन्दू धर्म में इसे रथ यात्रा कहते हैं। भगवान को उनके मौसी घर पहुंचाने के लिए भक्त रथ की रस्सी को खिचते हैं और प्रभु को मौसी घर पहुंचाते हैं। इस रथ यात्रा के दौरान प्रभु का रथ एक मजार पर भी रुकता है जो हिंदू मुस्लिम दोनों धर्मों के प्रति भगवान जगन्नाथ के स्नेह को दर्शाता है। इसके पीछे एक मुसलमान भक्त की अनोखी कथा है।

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कहा जाता है कि सालबेग नाम का एक मुसलमान व्यक्ति पूरी में रहा करता था। सालबेग की माता हिंदू थी और पिता मुसलमान। सालबेग मुग़ल सेना में सैनिक हुआ करता था । एक बार जंग में उसे माथे पर ऐसा घाव हुआ जो किसी भी वैद्य से ठीक नहीं हुआ। सेना से भी सालबेग को निकाल दिया गया।सालबेग इस वजह से निराशा में जीने लगा तब सालबेग की मां ने उसे भगवान जगन्नाथ की भक्ति करने की सलाह दी।

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मां की बात मानकर सालबेग भगवान जगन्नाथ की भक्ति में डूब गया। कुछ दिन बाद भगवान जगन्नाथ ने सालबेग को सपने में दर्शन दिए और उसे विभूति दिया और कहा कि इसे अपने माथे पर लगाओ । सालबेग ने सपने में ही उस विभूति को सिर पर लगाया और जैसे ही नींद खुली वो पूरी तरह स्वस्थ हो चुका था। इसके बाद सालबेग भगवान जगन्नाथ का भक्त बन गया।

जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिन्दुओ के प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। इस वजह से सालबेग को कभी भी भगवान जगन्नाथ के दर्शन नहीं हो पाए । परंतु इससे सालबेग की भक्ति में कोई असर नहीं पड़ा। वह मंदिर के बाहर बैठ कर ही भगवान की अराधना में लीन हो  गया। इस दौरान उन्होंने भगवान जगन्नाथ पर कई भक्ति गीत व कविताएं लिखीं। सालबेग हमेशा कहा करता था कि अगर उनकी भक्ति सच्ची है तो उनके मरने के बाद भगवान जगन्नाथ खुद उनकी मजार पर आएंगे।

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मृत्यु के बाद सलबेग को जगन्नाथ मंदिर और गुंडिचा मंदिर के बीच में दफना दिया गया। जिसके बाद उनकी वहाँ मजार बनाई गई। उनकी मृत्यु के बाद जब पहली बार रथ यात्रा निकाली गई तो रथ इनके मजार के सामने आकर स्वयं रूक गई । लोगों ने लाख कोशिशें की लेकिन रथ का पहिया अपने स्थान से हिला तक नहीं। जब सभी लोग परेशान हो गये तब किसी व्यक्ति ने उड़ीसा के राजा को भक्त सालबेग का जयकारा लगाने के लिए कहा। सालबेग के नाम का जयघोष होते ही रथ अपने आप चल पड़ा।

कहते हैं कि भगवान जगन्नाथ उस समय रथ से उतरकर अपने भक्त सालबेग को दर्शन देने गए थे। थोड़ी देर रुकने के बाद रथ फिर वापस चलने लगा। लोग समझ गए कि भगवान अपने भक्त को दर्शन देने गए हैं। आज भी भगवान जगन्नाथ का रथ सालबेग की मजार के सामने कुछ देर के लिए रोका जाता है। भक्त और भगवान के इस अनोखे रिश्ते का सम्मान देते हुए मुगल काल से चली आ रही उस परंपरा को निभाया जाता है ।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .