पुराने समय में गंगा को माँ और मोक्षदायिनी माना जाता था।
और सिक्का फेंकना दान और समर्पण का प्रतीक था । यह अहंकार और त्याग का संकेत माना जाता था।
गंगा दर्शन के समय लोग मन में संकल्प लेते थे, और सिक्का अर्पित कर गंगा को साक्षी बनाते थे।
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ससे मन को विश्वास मिलता था,और संकल्प और भी मजबूत हो जाता था।
उस दौर में सिक्के तांबे या पीतल के होते थे, जो जल को शुद्ध कर देते थे —इसलिए यह परंपरा प्रतीकात्मक के साथ व्यावहारिक भी थी।
वही घाटों पर जरूरतमंद लोग, पुजारी और सफाईकर्मी
नदी से सिक्के निकाल लेते थे। यह एक तरह का अप्रत्यक्ष दान था।
लेकिन अब सिक्के स्टील और निकेल के हैं, जो गंगा को प्रदूषित करते हैं।
और शास्त्रों में कहीं भी गंगा में सिक्का फेंकना अनिवार्य नहीं कहा गया है।
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