कहानी पूरी के भगवान जगन्नाथ की , क्यों हैं उनकी मूर्ति अधूरी

By Admin

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सोशल संवाद / डेस्क :  भगवान जगन्नाथ का मंदिर ओडिशा के पुरी शहर में स्थित है, यहां भगवान जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की भी पूजा की जाती है। ये एकमात्र ऐसे भगवान है जिनकी मूर्ति अधूरी है । और हर 12 साल में इनकी मूर्ति भी बदली जाती है ।चलिए जानते है इसके पीछे की सारी कहानी ।

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भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। वास्तव में, उनके पास भगवान विष्णु के सभी अवतारों के गुण हैं। भगवान जगन्नाथ की अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग रूपों में पूजा की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण मानव के रूप में जन्मे थे, इसलिए वे भी कालचक्र से बंधे थे। उनके भी शरीर का अंत होना था। महाभारत युद्ध के काफी समय बाद वे वन में एक पेड़ के नीचे लेटे हुए थे, तभी एक बहेलिया को उनके पैर मछली जैसे प्रतीत हुए और उसने बाण चला दिया। उससे भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु हो गई।

बताया जाता है कि पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया। अग्नि ने उनके पूरे शरीर को जला दिया, लेकिन उनका पवित्र हृदय नहीं जल पाया। वह धड़क रहा था। तब पांडवों ने उनके हृदय को समुद्र जल में प्रवाहित कर दिया। वह पवित्र हृदय जल में बहते हुए पुरी के तट पर पहुंच गया, जो एक लट्ठ का स्वरूप ले लिया था। वहां के राजा इंद्रद्युम्न को रात में स्वप्न आया, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने उनको दर्शन दिया और लट्ठ स्वरूप हृदय के बारे में बताया। अगली सुबह राजा पुरी के समुद्र तट पर पहुंचे और उसे अपने साथ लेकर आए। देव शिल्पी विश्वकर्मा ने उस लट्ठ की मदद से भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियां बनाईं। उनको ही श्री जगन्नाथ मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित किया गया। बताया जाता है कि जहां पर ये मूर्तियां स्थित हैं, वहां पर भगवान श्रीकृष्ण का हृदय आज भी धड़कता है।

कहते है विश्‍वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आए थे । उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनाएंगे और अकेले में बनाएंगे। कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गई। लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी तो राजा को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया।

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जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी मूर्तियां मिली पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।

जगन्नाथ मंदिर के मूर्तियों की यह विशेषता है कि हर 15 या 20 साल पर उनको बदल दिया जाता है। नीम की लकड़ी से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां बनाकर नव कलेवर रस्म होती है। इसमें मंदिर के पुजारी आंखों पर पट्टी बांधकर नव कलेवर रस्म निभाते हैं, जिसमें पुरानी मूर्तियों को हटाकर नई मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा होती है।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का हिंदू धर्म में काफी महत्व है। हर साल पुरी में इस रथ यात्रा का विशाल आयोजन किया जाता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक, हर साल पुरी में इस रथ यात्रा का विशाल आयोजन किया जाता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक, हर साल आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को रथ यात्रा निकाली जाती है। बता दें कि उड़ीसा राज्य के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर का भारत के चार पवित्र धामों में से एक है। भगवान जगन्नाथ की इस रथ यात्रा में उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भी शामिल होती हैं।

माना जाता है कि एक बार भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने नगर देखने की इच्छा की। बहन की इस इच्छा को पूरा करने के लिए भगवान जगन्नाथ और बलभद्र उन्हें रथ पर बैठाकर नगर दिखाने निकल गए। इस दौरान वे अपनी मौसी के घर भी गए जो गुंडिचा में रहती थी। तभी से इस रथ यात्रा की परंपरा शुरू हुई।

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