शंकराचार्य कैसे बनते हैं? योग्यता, प्रक्रिया और परंपरा

By Tami

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How does one become a Shankaracharya

धर्म संवाद / डेस्क : भारत की सनातन परंपरा में शंकराचार्य का पद केवल एक धार्मिक पद नहीं, बल्कि वेदांत दर्शन, धर्म और आध्यात्मिक अनुशासन का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। बहुत से लोगों के मन में यह सवाल होता है कि शंकराचार्य कैसे बनते हैं, क्या इसके लिए चुनाव होता है या किसी राजकीय प्रक्रिया से नियुक्ति होती है? आइए विस्तार से समझते हैं।

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शंकराचार्य कौन होते हैं?

शंकराचार्य वे संन्यासी होते हैं जो आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठों के पीठाधीश्वर (मुखिया) होते हैं। ये मठ देश की चारों दिशाओं में स्थित हैं:

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  • श्रृंगेरी मठ – कर्नाटक (दक्षिण)
  • ज्योतिर्मठ – बद्रीनाथ, उत्तराखंड (उत्तर)
  • शारदा मठ – द्वारका, गुजरात (पश्चिम)
  • गोवर्धन मठ – पुरी, ओडिशा (पूर्व)

शंकराचार्य बनने की मुख्य योग्यता

शंकराचार्य बनने के लिए कोई सामान्य डिग्री या आवेदन प्रक्रिया नहीं होती। इसके लिए कठोर आध्यात्मिक योग्यताएँ आवश्यक होती हैं:

  • ब्रह्मचर्य और संन्यास जीवन का पालन
  • वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद गीता का गहन ज्ञान
  • अद्वैत वेदांत दर्शन में प्रवीणता
  • गुरु-शिष्य परंपरा में दीक्षा प्राप्त होना
  • सांसारिक मोह-माया से पूर्ण वैराग्य

शंकराचार्य बनने की प्रक्रिया कैसे होती है?

शंकराचार्य बनने की प्रक्रिया पूरी तरह गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित होती है:

  • बाल्यकाल या युवावस्था में संन्यास
    इच्छुक व्यक्ति बहुत कम उम्र में ही संन्यास ग्रहण करता है।
  • गुरु के आश्रम में शिक्षा
    वर्षों तक वेदांत, शास्त्र, तर्क और साधना का अभ्यास कराया जाता है।
  • योग्यता की परीक्षा
    शिष्य की विद्वता, चरित्र, संयम और नेतृत्व क्षमता परखी जाती है।
  • उत्तराधिकारी का चयन
    वर्तमान शंकराचार्य अपने योग्यतम शिष्य को उत्तराधिकारी घोषित करते हैं।
  • पट्टाभिषेक (गद्दी सौंपना)
    विशेष वैदिक अनुष्ठान के बाद शिष्य को शंकराचार्य की गद्दी सौंपी जाती है।
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क्या शंकराचार्य बनने के लिए चुनाव होता है?

❌ नहीं।
शंकराचार्य बनने के लिए न तो कोई चुनाव होता है और न ही सरकार की भूमिका होती है। यह पूरी तरह धार्मिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है।

क्या शंकराचार्य गृहस्थ हो सकते हैं?

❌ नहीं।
शंकराचार्य केवल संन्यासी होते हैं। उन्हें आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है।

शंकराचार्य की भूमिका क्या होती है?
  • सनातन धर्म की रक्षा और प्रचार
  • वेदांत दर्शन का मार्गदर्शन
  • सामाजिक और धार्मिक विषयों पर मत प्रकट करना
  • शास्त्रीय विवादों का समाधान
  • शिष्यों और समाज को आध्यात्मिक दिशा देना

शंकराचार्य का पद क्यों विशेष माना जाता है?

क्योंकि यह पद ज्ञान, त्याग और तपस्या का प्रतीक है। शंकराचार्य किसी राजनीतिक शक्ति के नहीं, बल्कि धर्म और चेतना के प्रतिनिधि होते हैं।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .