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Pitru Paksha 2026: श्राद्ध के लिए ये 3 मुहूर्त हैं शुभ

By Tami

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Shraddha Muhurat

धर्म संवाद / डेस्क : हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, तर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने की विशेष अवधि माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मिक शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य करते हैं।

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धार्मिक परंपराओं में केवल श्राद्ध की तिथि ही नहीं, बल्कि उसके लिए उचित समय का भी विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता के अनुसार, श्राद्ध कर्म के लिए अपराह्न काल सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसी अवधि में कुतुप और रौहिण जैसे विशेष काल भी आते हैं। अगर आप पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने जा रहे हैं, तो इन शुभ समयों और उनसे जुड़ी मान्यताओं के बारे में जानना जरूरी है।

श्राद्ध के लिए कौन सा समय शुभ माना जाता है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध कर्म के लिए दिन के उस हिस्से को प्राथमिकता दी जाती है, जब सूर्य मध्याह्न के आसपास होता है और उसके बाद का समय शुरू होता है। कुतुप काल, रौहिण काल और अपराह्न काल को श्राद्ध के लिए विशेष माना गया है। हालांकि, इन मुहूर्तों का वास्तविक समय हर दिन और स्थान के सूर्योदय-सूर्यास्त के अनुसार बदलता है। इसलिए किसी निश्चित शहर के लिए श्राद्ध का समय स्थानीय पंचांग के अनुसार ही देखना चाहिए।

1. कुतुप मुहूर्त में श्राद्ध करना माना जाता है शुभ

श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप काल को विशेष महत्व दिया गया है। परंपरागत रूप से दिनमान को 15 बराबर भागों में बांटने पर आठवें मुहूर्त को कुतुप काल कहा जाता है। यह समय सामान्यतः दोपहर के आसपास पड़ता है, लेकिन इसकी सटीक अवधि स्थान और उस दिन के दिनमान के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। धार्मिक मान्यताओं में कुतुप काल को पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म के लिए शुभ माना गया है। इस दौरान श्रद्धापूर्वक किए गए कर्मों के माध्यम से पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।

2. रौहिण काल भी श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण

कुतुप काल के बाद आने वाले समय को रौहिण या रोहिण काल कहा जाता है। दिनमान को 15 हिस्सों में विभाजित करने पर यह नौवां मुहूर्त माना जाता है। श्राद्ध की परंपराओं में इस समय को भी पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। इस दौरान तर्पण, पिंडदान, दान और अन्य श्राद्ध कर्म किए जा सकते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा से किए गए श्राद्ध कर्म से पितरों की तृप्ति और परिवार की सुख-शांति की कामना की जाती है।

3. अपराह्न काल है श्राद्ध का प्रमुख समय

अपराह्न काल को श्राद्ध कर्म के लिए सबसे महत्वपूर्ण समयों में माना जाता है। पितृ पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध कर्म को सामान्यतः इसी अवधि में करने की परंपरा है। अपराह्न का समय हर दिन समान नहीं होता। यह सूर्योदय और सूर्यास्त के आधार पर निर्धारित किया जाता है। इसलिए सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक का एक निश्चित समय सभी स्थानों पर लागू करना सही नहीं है। श्राद्ध के दिन स्थानीय पंचांग में दिए गए अपराह्न काल और श्राद्ध तिथि के अनुसार कर्म करना अधिक उचित माना जाता है।

श्राद्ध के दौरान किन बातों का रखें ध्यान?

तिथि के साथ समय भी देखें

श्राद्ध कर्म के लिए पितर की संबंधित तिथि का चयन करने के साथ उस दिन का उचित श्राद्ध काल भी देखना चाहिए। तिथि और मुहूर्त की गणना स्थान के अनुसार अलग हो सकती है।

काले तिल और कुश का महत्व

तर्पण और श्राद्ध कर्म में काले तिल और कुश का प्रयोग हिंदू धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण माना जाता है। इनका इस्तेमाल पितरों के निमित्त किए जाने वाले तर्पण में किया जाता है।

सात्विकता और श्रद्धा बनाए रखें

श्राद्ध के दिन सात्विक भोजन, संयम और श्रद्धा का पालन करने की परंपरा है। परिवार के सदस्यों को आपसी विवाद और कटु व्यवहार से बचना चाहिए तथा पितरों का स्मरण करते हुए कर्म करना चाहिए।

दान और भोजन की परंपरा

श्राद्ध कर्म के बाद अपनी पारिवारिक परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण भोजन, जरूरतमंदों को भोजन तथा अन्न-वस्त्र आदि का दान किया जाता है। इसका उद्देश्य पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सेवा की भावना व्यक्त करना है।

क्या सुबह या रात में श्राद्ध करना चाहिए?

धार्मिक परंपराओं में श्राद्ध कर्म के लिए अपराह्न काल को प्राथमिकता दी गई है। इसी वजह से श्राद्ध को सामान्य पूजा की तरह प्रातःकाल करने के बजाय संबंधित तिथि के अपराह्न काल में करने की परंपरा है। रात्रि या संध्या के समय श्राद्ध करने के बजाय स्थानीय पंचांग में दिए गए श्राद्ध मुहूर्त का पालन करना बेहतर माना जाता है। किसी विशेष परिस्थिति में परिवार की परंपरा या आचार्य की सलाह को भी ध्यान में रखना चाहिए।

श्राद्ध के लिए कुतुप और रौहिण काल क्यों महत्वपूर्ण हैं?

श्राद्ध संबंधी धार्मिक परंपराओं में दिन के कुछ विशेष हिस्सों को पितृ कर्म के लिए अधिक उपयुक्त माना गया है। इनमें कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल प्रमुख हैं।

इनका समय घड़ी के अनुसार हर दिन एक जैसा नहीं होता, क्योंकि मुहूर्त की गणना दिनमान के आधार पर होती है। इसलिए इंटरनेट पर दिए गए किसी सामान्य समय को देखकर श्राद्ध करने के बजाय अपने शहर के पंचांग में दिए गए समय को प्राथमिकता देना चाहिए।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .

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