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काशी की अनोखी होली: तंत्र की देवी मां चौसठ्ठी को चढ़ता है पहला गुलाल

By Tami

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धर्म संवाद / डेस्क : भारत में होली रंगों, उमंग और उल्लास का पर्व है, लेकिन काशी में यह केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, तंत्र और भक्ति का अद्भुत संगम है। यहां होली की शुरुआत किसी चौक-चौराहे से नहीं, बल्कि देवी के चरणों से होती है। काशी में पहला गुलाल तंत्र की देवी मां चौसठ्ठी को अर्पित किया जाता है। कहा जाता है कि बिना मां को गुलाल चढ़ाए काशी में होली अधूरी मानी जाती है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी उतनी ही श्रद्धा से निभाई जाती है। आइए जानते हैं इस अनोखी परंपरा की पूरी कहानी।

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काशी की होली: परंपराओं की रंगीन झलक

काशी की होली की शुरुआत होती है रंगभरी एकादशी से। इसी दिन बाबा विश्वनाथ का “गौना” माना जाता है। विवाह के बाद मां पार्वती के साथ बाबा विश्वनाथ पहली बार काशी आते हैं। इस अवसर पर काशी विश्वनाथ मंदिर में गुलाल अर्पित किया जाता है और भक्त बाबा से होली खेलने की अनुमति मांगते हैं।

इसके बाद काशी में होली का रंग चढ़ने लगता है। कहीं फाग गाया जाता है, कहीं ढोल-मंजीरे बजते हैं। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाटों पर भस्म होली की भी परंपरा है, जहां राख से होली खेली जाती है। लेकिन इन सभी परंपराओं के बीच एक विशेष परंपरा है — काशी में पहला गुलाल मां चौसठ्ठी को चढ़ता है।

दशाश्वमेध घाट के पास स्थित आस्था का केंद्र

चौसठ्ठी देवी मंदिर दशाश्वमेध घाट के पास स्थित है। संकरी गलियों से होकर जब भक्त मंदिर तक पहुंचते हैं, तो वहां का आध्यात्मिक वातावरण मन को एक अलग ही शांति देता है।

मंदिर का इतिहास लगभग 500 वर्ष पुराना माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव ने काशी को अपना धाम बनाया, तब 64 योगिनियां भी उनके साथ यहां आईं। इन्हें शिव की शक्तियां माना जाता है। कहा जाता है कि शिव के आदेश से ये योगिनियां काशी की रक्षा करती हैं। इन्हीं 64 योगिनियों के स्वरूप में मां चौसठ्ठी की पूजा होती है। इसलिए इस मंदिर को काशी की तांत्रिक शक्ति का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

क्यों कहा जाता है ‘तंत्र की देवी’?

मां चौसठ्ठी को ‘तंत्र की देवी वाराणसी’ भी कहा जाता है। तांत्रिक परंपराओं में 64 योगिनियों का विशेष महत्व है। ये देवी शक्ति, सिद्धि और मुक्ति प्रदान करने वाली मानी जाती हैं। तंत्र साधना में इनका आह्वान किया जाता है। मान्यता है कि मां की कृपा से साधक को मानसिक शांति, भय से मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है।

एक स्थानीय पुजारी बताते हैं, “मां चौसठ्ठी केवल शक्ति की प्रतीक नहीं हैं, बल्कि काशी की रक्षा करने वाली देवी हैं। इनके आशीर्वाद से ही यहां का हर उत्सव पूर्ण होता है।”

काशी में पहला गुलाल: सदियों पुरानी परंपरा

होली के दिन सुबह-सुबह भक्त मुट्ठी भर अबीर-गुलाल लेकर मंदिर पहुंचते हैं। सबसे पहले मां के चरणों में गुलाल अर्पित किया जाता है। इसके बाद ही लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। यह परंपरा इतनी गहरी है कि कई परिवार पीढ़ियों से इसे निभा रहे हैं।

एक बुजुर्ग श्रद्धालु कहते हैं, “हमारे बाबा भी पहले मां को गुलाल चढ़ाते थे, हमारे पिता भी, और अब हम भी। मां को बिना रंग चढ़ाए होली कैसी?” कहा जाता है कि लगभग 500 वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। स्थानीय मान्यता है कि यदि मां को पहला गुलाल न चढ़ाया जाए, तो त्योहार की पूर्णता नहीं होती।

होली के दिन मंदिर का दृश्य

होली की सुबह जैसे ही सूर्य की किरणें गंगा पर पड़ती हैं, वैसे ही चौसठ्ठी देवी मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। मंदिर प्रांगण अबीर-गुलाल से रंगीन हो जाता है। ढोल की थाप, शंखनाद और “हर-हर महादेव” के जयकारे से वातावरण गूंज उठता है।

महिलाएं फाग गाती हैं “आज बिरज में होली रे रसिया…” गुलाबी, पीले और लाल रंगों से सजा मंदिर ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्वयं देवी रंगों में सराबोर होकर भक्तों को आशीर्वाद दे रही हों।

आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व

‘चौसठ्ठी देवी होली’ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक पहचान है। यहां तंत्र और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। लोग मानते हैं कि मां को गुलाल अर्पित करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, बाधाएं समाप्त होती हैं और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

यह परंपरा हमें सिखाती है कि हर उत्सव की शुरुआत आस्था से होनी चाहिए। काशी में पहला गुलाल चढ़ाने की परंपरा केवल रंगों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि देवी से आशीर्वाद लेने का माध्यम है।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .

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