गुरु प्रदोष व्रत 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

By Tami

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गुरु प्रदोष व्रत 2026

धर्म संवाद / डेस्क : हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित प्रमुख व्रतों में से एक माना जाता है। हर महीने त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत रखा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार एक महीने में दो प्रदोष व्रत पड़ते हैं—एक शुक्ल पक्ष और दूसरा कृष्ण पक्ष में।

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प्रदोष व्रत में शाम के समय भगवान शिव की विशेष पूजा करने की परंपरा है। मान्यता है कि प्रदोष काल में भगवान शिव की आराधना करने से भक्तों को सुख-समृद्धि, शांति और मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस बार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को लेकर लोगों में असमंजस बना हुआ है। आइए जानते हैं गुरु प्रदोष व्रत की सही तिथि, पूजा का समय, महत्व और पूजा विधि।

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गुरु प्रदोष व्रत 2026 कब है?

पंचांग गणना के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 7 अक्टूबर 2026 की रात 11:16 बजे शुरू होगी और इसका समापन 8 अक्टूबर 2026 की रात 10:15 बजे होगा। प्रदोष व्रत में प्रदोष काल के दौरान पड़ने वाली त्रयोदशी तिथि को विशेष महत्व दिया जाता है। इसलिए इस गणना के अनुसार गुरु प्रदोष व्रत 8 अक्टूबर 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। गुरुवार के दिन पड़ने के कारण इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाएगा।

गुरु प्रदोष व्रत का क्या महत्व है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष काल भगवान शिव की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। इस समय शिव परिवार की आराधना करने से भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। गुरु प्रदोष को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में विशेष फल बताए गए हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से जीवन में आने वाली बाधाएं कम होती हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। विवाह में देरी या वैवाहिक जीवन से जुड़ी परेशानियों के लिए भी प्रदोष व्रत करने की धार्मिक मान्यता है। हालांकि इन मान्यताओं को आस्था के रूप में ही देखना चाहिए।

गुरु प्रदोष व्रत करने से क्या लाभ मिलता है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरु प्रदोष व्रत रखने और भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा करने से कई तरह के आध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो सकते हैं।

  • भगवान शिव की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।
  • मन की शांति और सकारात्मकता बढ़ती है।
  • परिवार में सुख-शांति की कामना की जाती है।
  • विवाह संबंधी बाधाओं के दूर होने की धार्मिक मान्यता है।
  • शत्रु बाधा से मुक्ति के लिए भी यह व्रत किया जाता है।
  • मनोकामना पूर्ति के लिए भक्त भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं।
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गुरु प्रदोष व्रत की पूजा विधि

प्रदोष व्रत में सुबह से ही सात्विकता और संयम का पालन करने की परंपरा है। शाम के समय प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा विशेष रूप से की जाती है।

1. स्नान करके व्रत का संकल्प लें

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद भगवान सूर्य को जल अर्पित करके प्रदोष व्रत का संकल्प लें।

2. पूजा स्थल की सफाई करें

घर के पूजा स्थान को साफ करके भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। पूजा की सभी आवश्यक सामग्री पहले से तैयार कर लें।

3. भगवान शिव का अभिषेक करें

प्रदोष काल में भगवान शिव का जल, दूध या पंचामृत से अभिषेक किया जा सकता है। इसके बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, फूल, धूप और दीप अर्पित करें।

4. शिव परिवार की पूजा करें

भगवान शिव के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय और नंदी की पूजा करें। अपनी श्रद्धा के अनुसार मंत्र जाप और शिव चालीसा का पाठ कर सकते हैं।

5. प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें

पूजा के दौरान प्रदोष व्रत की कथा का पाठ या श्रवण करें। इसके बाद भगवान शिव की आरती करें और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें।

6. व्रत का पारण करें

व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपनी स्वास्थ्य क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार उपवास करना चाहिए। पूजा पूर्ण होने के बाद उचित समय पर सात्विक भोजन या फलाहार से व्रत का पारण किया जा सकता है।

प्रदोष व्रत में किन बातों का रखें ध्यान?

प्रदोष व्रत के दौरान मन, वचन और कर्म से संयम रखने की परंपरा है। भगवान शिव की पूजा में श्रद्धा और सात्विकता को विशेष महत्व दिया जाता है।

व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के नशे और तामसिक भोजन से बचना उचित माना जाता है। पूजा में अपनी क्षमता के अनुसार सामग्री का उपयोग करें। किसी विशेष संकल्प या पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत कर रहे हैं तो उसी विधि का पालन करना बेहतर होता है।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .