धर्म संवाद / डेस्क : शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा का नाम सुनते ही मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं, सजे हुए पूजा पंडाल, धुनुची नृत्य और ढाक की गूंज मन में उभरने लगती है। खासकर बंगाली दुर्गा पूजा में ढाक की थाप का अपना अलग महत्व है। इसकी गूंज सुनते ही ऐसा महसूस होने लगता है, मानो मां दुर्गा के आगमन का उत्सव शुरू हो गया हो।
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भारत में अलग-अलग त्योहारों पर ढोल-नगाड़े बजाने की परंपरा है, लेकिन बंगाली दुर्गा पूजा में ढाक की आवाज उत्सव की खास पहचान मानी जाती है। पूजा की शुरुआत से लेकर आरती, धुनुची नृत्य और विसर्जन तक ढाकी अपनी कला से पूरे माहौल को भक्तिमय बना देते हैं।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दुर्गा पूजा में सामान्य ढोल की जगह ढाक को इतनी अहमियत क्यों दी जाती है? ढाक की थाप का मां दुर्गा के आह्वान से क्या संबंध है और यह पारंपरिक वाद्ययंत्र दिखने में ढोल से कितना अलग है? आइए जानते हैं ढाक की परंपरा, इसकी विशेषताओं और दुर्गा पूजा में इसके धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व के बारे में।
दुर्गा पूजा में ढाक क्यों बजाया जाता है?
बंगाली दुर्गा पूजा में ढाक को उत्सव की आत्मा माना जाता है। इसकी गहरी और लयबद्ध ध्वनि पूजा पंडालों में विशेष वातावरण तैयार करती है। महालय से लेकर विजयादशमी तक देवी आराधना से जुड़े विभिन्न आयोजनों में ढाक की थाप सुनाई देती है।
धार्मिक परंपराओं में ढाक की ध्वनि को देवी की आराधना, मंगल उत्सव और भक्तिभाव से जोड़ा जाता है। मां दुर्गा के बोधन यानी देवी के प्रतीकात्मक जागरण और आह्वान से जुड़े अनुष्ठानों के दौरान भी ढाक बजाया जाता है। इसकी गूंज भक्तों में उत्साह और श्रद्धा का संचार करती है।
ढाक बजाने की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह बंगाल की लोकसंस्कृति और सामुदायिक उत्सव का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यही कारण है कि दुर्गा पूजा के दौरान ढाक की आवाज सुनते ही लोगों को त्योहार के आगमन का एहसास होने लगता है।
मां दुर्गा के आह्वान से जुड़ी है ढाक की थाप
बंगाली दुर्गा पूजा में बोधन का विशेष महत्व है। इस अनुष्ठान में मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है और पूजा की प्रमुख परंपराओं की शुरुआत होती है।
इस दौरान ढाक की गूंज धार्मिक वातावरण को और प्रभावशाली बनाती है। ढाक की लय के साथ मंत्रोच्चार, शंखनाद और अन्य पारंपरिक पूजा विधियां उत्सव को विशेष स्वरूप प्रदान करती हैं।
धार्मिक मान्यताओं में ढाक की ध्वनि को शुभता और सकारात्मकता से जोड़ा जाता है। हालांकि, ढाक बजाने को देवी के आह्वान के लिए अनिवार्य बताने के बजाय इसे बंगाली दुर्गा पूजा की एक महत्वपूर्ण पारंपरिक अभिव्यक्ति के रूप में समझना अधिक उचित है।
धुनुची नृत्य और ढाक का क्या है संबंध?
दुर्गा पूजा के दौरान होने वाले धुनुची नृत्य की कल्पना ढाक की थाप के बिना अधूरी लगती है। खासकर महाष्टमी और महानवमी के अवसर पर आरती के समय यह दृश्य भक्तों को आकर्षित करता है।
धुनुची एक पारंपरिक पात्र होता है, जिसमें धूप और अन्य सुगंधित पदार्थ जलाए जाते हैं। भक्त इसे हाथों में लेकर ढाक की लय पर नृत्य करते हैं और मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
जैसे-जैसे ढाकी अपनी थाप की गति और लय बदलते हैं, धुनुची नृत्य का उत्साह भी बढ़ता जाता है। ढाक की गहरी आवाज, आरती की लौ और धुएं से बनता वातावरण दुर्गा पूजा की एक खास सांस्कृतिक पहचान है।
धुनुची नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भक्ति, परंपरा और सामूहिक उत्साह की अभिव्यक्ति है। हालांकि, जलते हुए पात्र के साथ नृत्य करते समय आग से सुरक्षा का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
ढाक और ढोल में क्या अंतर है?
ढाक और ढोल दोनों ताल वाद्ययंत्र हैं, लेकिन इनके आकार, बनावट और बजाने के तरीके में अंतर होता है।
ढाक आमतौर पर आकार में बड़ा होता है। इसका मुख्य हिस्सा लकड़ी के खोल से बनाया जाता है और दोनों ओर झिल्ली लगी होती है। इसे पारंपरिक रूप से विशेष छड़ियों की मदद से बजाया जाता है। इसकी आवाज गहरी, गूंजदार और दूर तक सुनाई देने वाली होती है।
वहीं, ढोल के आकार और बनावट में क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार काफी विविधता देखने को मिलती है। कई प्रकार के ढोल हाथों और छड़ियों, दोनों से बजाए जाते हैं।
ढाक को अक्सर रस्सियों या पट्टियों की मदद से कंधे पर लटकाकर बजाया जाता है। बंगाल के पारंपरिक ढाकी इसे बजाते समय शरीर की लय और हाथों की गति से प्रस्तुति को और आकर्षक बना देते हैं। ढाक की सजावट में सफेद पंखों और अन्य पारंपरिक सामग्रियों का इस्तेमाल भी देखने को मिलता है। इसकी विशिष्ट आवाज और प्रस्तुति इसे दुर्गा पूजा के दूसरे वाद्ययंत्रों से अलग पहचान देती है।
कौन होते हैं ढाकी? जानिए इनकी खास भूमिका
ढाक बजाने वाले कलाकारों को ढाकी कहा जाता है। ये कलाकार पीढ़ियों से चली आ रही वादन परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। दुर्गा पूजा के दौरान ढाकी अलग-अलग धार्मिक अवसरों और अनुष्ठानों के अनुसार विशेष ताल बजाते हैं।
महाषष्ठी के बोधन से लेकर महाष्टमी की आरती और विजयादशमी के विसर्जन तक उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उनकी थाप पूजा पंडालों में मौजूद श्रद्धालुओं को एक साझा उत्सव के अनुभव से जोड़ती है।
कई ढाकी पूजा के दिनों में एक पंडाल से दूसरे पंडाल तक जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। उनकी वादन शैली में क्षेत्रीय विविधता और पारंपरिक संगीत का प्रभाव भी दिखाई देता है। ढाकी केवल वाद्ययंत्र बजाने वाले कलाकार नहीं हैं, बल्कि वे बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने में भी योगदान देते हैं।
ढाक की गूंज क्यों बन गई बंगाली दुर्गा पूजा की पहचान?
बंगाल में दुर्गा पूजा धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दौरान पूजा पंडालों में परिवार और समुदाय के लोग एक साथ जुटते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम, पारंपरिक भोजन, आरती और प्रतिमा दर्शन उत्सव को खास बनाते हैं।
इन सभी गतिविधियों के बीच ढाक की आवाज एक विशेष पहचान बनाती है। इसकी थाप देवी के आगमन, पूजा के उत्साह और उत्सव की सामूहिक भावना को व्यक्त करती है।
समय के साथ बंगाली दुर्गा पूजा की परंपराएं देश के दूसरे हिस्सों और विदेशों तक पहुंची हैं। आज दिल्ली, मुंबई, जमशेदपुर और कई अन्य शहरों में आयोजित बंगाली दुर्गा पूजा में भी ढाक की गूंज सुनाई देती है। इस तरह ढाक केवल बंगाल का पारंपरिक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि दुर्गा पूजा की सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुका है।






