धर्म संवाद/ डेस्क : करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना के साथ निर्जला उपवास रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ की पूजा के दौरान व्रत कथा सुनना या पढ़ना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवसर पर माता करवा, भगवान गणेश और चंद्रमा की पूजा-अर्चना की जाती है। रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने और व्रत से जुड़े नियमों का पालन करने के बाद महिलाएं अपना उपवास खोलती हैं।
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करवा चौथ की कथा में वीरावती और उनके सात भाइयों का प्रसंग विशेष रूप से प्रचलित है। मान्यता है कि इस कथा को श्रद्धापूर्वक सुनने से व्रत का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। आइए जानते हैं करवा चौथ व्रत की संपूर्ण पौराणिक कथा और पूजा के दौरान इसे पढ़ने की परंपरा के बारे में।
करवा चौथ व्रत कथा 2026 का शुभ समय
करवा चौथ के दिन पूजा और कथा का समय स्थानीय पंचांग तथा पूजा मुहूर्त के अनुसार निर्धारित किया जाता है। पूजा के दौरान महिलाएं भगवान गणेश और माता करवा की आराधना करती हैं तथा परंपरा के अनुसार व्रत कथा सुनती हैं।
कथा पढ़ने से पहले पूजा की थाली तैयार कर लें और पूजा स्थल पर आवश्यक सामग्री रख लें। इसके बाद श्रद्धापूर्वक कथा का पाठ करें। चंद्रमा निकलने पर अर्घ्य देकर व्रत खोलने की परंपरा है।
ध्यान दें: पूजा मुहूर्त और चंद्रोदय का समय शहर के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए अपने शहर के पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि जरूर करें।
करवा चौथ की संपूर्ण व्रत कथा: वीरावती और सात भाइयों की कहानी
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में इन्द्रप्रस्थ नामक नगर में वेदशर्मा नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। उनका विवाह लीलावती नाम की स्त्री से हुआ था। उनके सात पुत्र और एक पुत्री थी, जिसका नाम वीरावती था। वीरावती अपने माता-पिता और सातों भाइयों की बेहद प्रिय थी।
समय बीतने के साथ वीरावती बड़ी हुई और उसका विवाह एक योग्य ब्राह्मण युवक से कर दिया गया। विवाह के बाद एक बार वह अपने मायके आई। उस समय करवा चौथ का पर्व था। वीरावती ने अपनी भाभियों के साथ अपने पति की लंबी आयु की कामना करते हुए व्रत रखा।
वीरावती ने पूरे श्रद्धाभाव से उपवास शुरू किया, लेकिन दिन बीतने के साथ उसे तेज भूख और प्यास सताने लगी। निर्जला व्रत के कारण उसका शरीर कमजोर पड़ने लगा और चेहरा मुरझा गया। अपनी लाडली बहन की यह हालत देखकर उसके सातों भाई चिंतित हो उठे।
भाइयों ने अपनी बहन से भोजन करने का आग्रह किया, लेकिन वीरावती ने साफ मना कर दिया। उसने कहा कि वह चंद्रमा के दर्शन करने और उन्हें अर्घ्य देने के बाद ही भोजन ग्रहण करेगी।
सात भाइयों ने बहन के लिए रची योजना
बहन की परेशानी देखकर उसके भाइयों ने एक उपाय सोचा। उनमें से एक भाई दूर स्थित एक वट वृक्ष पर चढ़ गया। उसके हाथ में छलनी और दीपक था। उसने दीपक को इस तरह रखा कि दूर से देखने पर वह चंद्रमा जैसा दिखाई देने लगा। इसके बाद भाइयों ने वीरावती से कहा कि चंद्रमा निकल आया है और अब वह अपना व्रत खोल सकती है। भूख से व्याकुल वीरावती उनकी बातों में आ गई। उसने दीपक की रोशनी को चंद्रमा समझ लिया और उसी के अनुसार पूजा करके भोजन करने बैठ गई। हालांकि, उसने वास्तविक चंद्रोदय से पहले ही भोजन ग्रहण कर लिया था।
व्रत खोलते ही मिलने लगे अशुभ संकेत
लोकप्रचलित कथा के अनुसार, वीरावती ने जैसे ही भोजन करना शुरू किया, उसे एक के बाद एक अशुभ संकेत मिलने लगे। पहले कौर में उसे बाल मिला। दूसरे कौर के समय उसे छींक आ गई और तीसरा कौर खाने से पहले ही ससुराल से संदेश आया कि उसके पति की तबीयत बिगड़ गई है।
जब वीरावती अपने ससुराल पहुंची, तो उसे पता चला कि उसके पति की मृत्यु हो चुकी है। यह समाचार सुनकर वह टूट गई और जोर-जोर से विलाप करने लगी। अपने पति को इस अवस्था में देखकर उसका दुख और भी बढ़ गया।
देवी इन्द्राणी ने वीरावती को बताया व्रत का महत्व
कथा के अनुसार, वीरावती के विलाप को सुनकर देवी इन्द्राणी उसके पास आईं और उसे सांत्वना दी। वीरावती ने उनसे पूछा कि करवा चौथ के दिन उसके साथ ऐसा दुखद प्रसंग क्यों हुआ। तब देवी इन्द्राणी ने उसे बताया कि उसने चंद्रमा को विधिपूर्वक अर्घ्य देने से पहले ही व्रत खोल लिया था। इसी कारण उसे यह कष्ट सहना पड़ा।
अपनी भूल का एहसास होने पर वीरावती ने देवी से अपने पति को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की। देवी इन्द्राणी ने उसे पूरे वर्ष आने वाली प्रत्येक मासिक चौथ का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने की सलाह दी। उन्होंने उसे विश्वास दिलाया कि इस प्रकार व्रत करने से उसके पति को पुनः जीवन प्राप्त हो सकेगा।
वीरावती को दोबारा मिला पति का साथ
देवी इन्द्राणी के निर्देश के अनुसार, वीरावती ने पूरे वर्ष प्रत्येक चौथ का व्रत विधि-विधान और श्रद्धा के साथ किया। उसने अपनी भूल का प्रायश्चित किया और भगवान से अपने पति के जीवन की कामना करती रही। पौराणिक मान्यता के अनुसार, वीरावती की श्रद्धा और व्रत के प्रभाव से उसका पति पुनः जीवित हो गया। इस तरह उसे दोबारा अपने पति का साथ प्राप्त हुआ और उसके वैवाहिक जीवन में खुशियां लौट आईं। इसी कथा के माध्यम से करवा चौथ के व्रत में श्रद्धा, संकल्प और पूजा-विधि के महत्व को बताया जाता है।
करवा चौथ पर व्रत कथा क्यों सुनी जाती है?
करवा चौथ की व्रत कथा सुनने की परंपरा धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि कथा के माध्यम से महिलाएं व्रत के उद्देश्य और उससे जुड़े पारंपरिक संदेशों को समझती हैं। वीरावती की कहानी विशेष रूप से चंद्रमा के दर्शन, पूजा-विधि और व्रत के संकल्प का महत्व बताती है।
करवा चौथ के दिन महिलाएं पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा करती हैं, कथा सुनती हैं और चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने पति की लंबी आयु तथा सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं।






