नवरात्रि में गरबा क्यों किया जाता है? जानें धार्मिक महत्व

By Tami

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Navratri Garba

धर्म संवाद / डेस्क : नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की आराधना और शक्ति की उपासना का प्रतीक है। इन नौ दिनों में देशभर के मंदिरों और पूजा पंडालों में भक्ति का विशेष माहौल देखने को मिलता है। गुजरात से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों और विदेशों तक नवरात्रि के दौरान गरबा की धूम रहती है। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान, लोकगीतों की धुन और गोल घेरे में घूमकर किया जाने वाला गरबा इस पर्व की खास पहचान बन चुका है।

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लेकिन क्या आप जानते हैं कि गरबा केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ भी छिपा है? गरबा के केंद्र में छेद वाला मिट्टी का घड़ा और उसके अंदर जलता दीपक जीवन, सृजन और देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वहीं, गरबा के दौरान बजाई जाने वाली तीन तालियों और डांडिया नृत्य का भी विशेष महत्व बताया जाता है।

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आइए जानते हैं कि नवरात्रि में गरबा क्यों किया जाता है, दीपक वाले मिट्टी के घड़े का क्या महत्व है और गरबा के पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं।

गरबा का धार्मिक महत्व क्या है?

गरबा गुजरात की प्रसिद्ध लोकनृत्य परंपरा है, जिसका विशेष संबंध नवरात्रि और मां अंबा की उपासना से है। इस नृत्य में श्रद्धालु गोल घेरे में घूमते हुए तालियों और संगीत की लय पर मां दुर्गा की आराधना करते हैं। समय के साथ गरबा गुजरात की सीमाओं से निकलकर पूरे भारत और दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय हो गया है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, गरबा के गोल घेरे को जीवन के निरंतर चलने वाले चक्र से जोड़कर देखा जाता है। जिस तरह सृष्टि में परिवर्तन लगातार होता रहता है, उसी तरह गोल घेरे में घूमते हुए श्रद्धालु जीवन की निरंतरता का प्रतीक प्रस्तुत करते हैं। इसके केंद्र में स्थापित दीपक को देवी शक्ति और जीवन की दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।

नवरात्रि के नौ दिनों में गरबा के माध्यम से भक्त मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यह आयोजन भक्ति के साथ-साथ सामूहिक एकता, उत्साह और सांस्कृतिक परंपराओं को भी मजबूत करता है।

गरबा के बीच में दीपक वाला मिट्टी का घड़ा क्यों रखा जाता है?

गरबा की सबसे खास परंपराओं में से एक है इसके केंद्र में छेद वाला मिट्टी का घड़ा रखना। गुजरात में इस घड़े को आमतौर पर ‘गरबो’ कहा जाता है। इसके अंदर दीपक जलाया जाता है, जिसे ‘गर्भ दीप’ के नाम से भी जाना जाता है। गरबा शब्द को संस्कृत के ‘गर्भ’ शब्द से जोड़कर देखा जाता है, जिसका अर्थ गर्भ या सृजन से संबंधित है। पारंपरिक व्याख्या में मिट्टी का घड़ा स्त्री की सृजन शक्ति और जीवन की उत्पत्ति का प्रतीक माना जाता है। घड़े के अंदर जलने वाली ज्योति जीवन, चेतना और देवी शक्ति का संदेश देती है।

घड़े के चारों ओर गोलाकार नृत्य करना इस मान्यता को दर्शाता है कि जीवन और सृष्टि की गति के केंद्र में दिव्य शक्ति विद्यमान है। इसी कारण गरबा के दौरान दीपक को विशेष श्रद्धा के साथ स्थापित किया जाता है।

मां दुर्गा की शक्ति का प्रतीक है गरबा

नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देता है। गरबा को भी मां शक्ति की आराधना से जुड़ी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा माना जाता है। गरबा के दौरान श्रद्धालु संगीत और ताल के साथ नृत्य करते हुए देवी के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करते हैं। गोल घेरे में सभी लोगों का एक साथ नृत्य करना समानता और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक भी है।

इस आयोजन में अलग-अलग आयु, समुदाय और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग एक साथ भाग लेते हैं। इससे आपसी मेलजोल, भाईचारे और सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा मिलता है। इस तरह गरबा धार्मिक आस्था के साथ समाज को जोड़ने का माध्यम भी बनता है।

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गरबा नंगे पैर क्यों किया जाता है?

नवरात्रि के दौरान कई जगहों पर गरबा नंगे पैर किया जाता है। इसके पीछे धार्मिक श्रद्धा और पूजा स्थल की पवित्रता से जुड़ी परंपरा है। जिस प्रकार मंदिर में प्रवेश करते समय जूते-चप्पल बाहर उतारे जाते हैं, उसी तरह कई गरबा आयोजनों में भी प्रतिभागी नंगे पैर नृत्य करते हैं। इस परंपरा को मां दुर्गा के प्रति सम्मान, विनम्रता और समर्पण के भाव से जोड़ा जाता है। नंगे पैर गरबा करना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि श्रद्धालु देवी की आराधना को पवित्र भाव से कर रहे हैं।

हालांकि, नंगे पैर गरबा करने की परंपरा हर आयोजन में अनिवार्य नहीं है। इसका पालन स्थानीय परंपरा, आयोजकों के नियमों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

गरबा में तीन तालियां बजाने का क्या अर्थ है?

गरबा के दौरान तालियों की लय नृत्य को खास बनाती है। कई पारंपरिक गरबा शैलियों में तीन तालियां बजाने की परंपरा देखने को मिलती है। धार्मिक व्याख्याओं में इन तालियों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश से जोड़कर देखा जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, तीन तालियां सृष्टि की रचना, पालन और परिवर्तन की शक्तियों का प्रतीक हैं। वहीं, गरबा में तालियों की लय सामूहिक ऊर्जा और भक्ति के भाव को भी प्रकट करती है।

हालांकि, तीन तालियों का अर्थ गरबा की अलग-अलग क्षेत्रीय और सांस्कृतिक परंपराओं में भिन्न रूप से समझाया जा सकता है। इसका मूल उद्देश्य नृत्य की लय बनाए रखना और मां की आराधना में सामूहिक रूप से शामिल होना है।

डांडिया रास का मां दुर्गा से क्या संबंध है?

नवरात्रि के दौरान गरबा के साथ डांडिया रास भी बड़े उत्साह से खेला जाता है। इसमें रंगीन लकड़ी की छड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। डांडिया की छड़ियों को लोकप्रिय धार्मिक व्याख्याओं में मां दुर्गा के शस्त्रों का प्रतीक माना जाता है। मां दुर्गा के हाथों में सुशोभित तलवार और त्रिशूल बुराई के विनाश तथा धर्म की रक्षा का संदेश देते हैं। डांडिया रास को इसी शक्ति और विजय की भावना से जोड़कर देखा जाता है।

गरबा और डांडिया दोनों में संगीत, ताल और सामूहिक नृत्य का महत्वपूर्ण स्थान है। हालांकि, दोनों की नृत्य शैली अलग है। गरबा में मुख्य रूप से गोल घेरे में तालियों और कदमों के साथ नृत्य किया जाता है, जबकि डांडिया रास में प्रतिभागी एक-दूसरे के साथ छड़ियों की ताल मिलाकर नृत्य करते हैं।

गरबा केवल नृत्य नहीं, गुजरात की सांस्कृतिक पहचान भी है

गरबा आज गुजरात की पहचान बन चुका है। नवरात्रि के दौरान अहमदाबाद, वडोदरा और राज्य के अन्य शहरों में बड़े स्तर पर गरबा कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों में पारंपरिक संगीत, लोकगीत, रंगीन परिधान और सामूहिक नृत्य के माध्यम से स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।

अब गरबा भारत के कई राज्यों के साथ-साथ विदेशों में बसे भारतीय समुदायों के बीच भी लोकप्रिय है। नवरात्रि के अवसर पर अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य देशों में भी गरबा कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। गरबा की सांस्कृतिक महत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। दिसंबर 2023 में यूनेस्को ने गुजरात के गरबा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया। इससे इस पारंपरिक नृत्य की वैश्विक पहचान और मजबूत हुई।

नवरात्रि में गरबा करने का संदेश

नवरात्रि में गरबा का महत्व केवल उत्सव और मनोरंजन तक सीमित नहीं है। यह मां दुर्गा की शक्ति, जीवन की निरंतरता, सामूहिक एकता और भारतीय सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। गरबा के केंद्र में जलता दीपक दिव्य ऊर्जा का संदेश देता है, जबकि गोल घेरे में किया जाने वाला नृत्य जीवन की गति और सृष्टि के चक्र की याद दिलाता है।

इसी कारण नवरात्रि के नौ दिनों में गरबा को मां शक्ति की आराधना का एक विशेष माध्यम माना जाता है। श्रद्धालु संगीत और नृत्य के जरिए अपनी भक्ति व्यक्त करते हैं और इस परंपरा को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाते हैं।

Tami

Tamishree Mukherjee I am researching on Sanatan Dharm and various hindu religious texts since last year .