धर्म संवाद / डेस्क : शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि का तीसरा दिन मां चंद्रघंटा को समर्पित है। देवी के इस स्वरूप को साहस, शक्ति, शांति और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत कथा का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति तथा कठिन परिस्थितियों का सामना करने का संबल मिलता है।
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मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। इसी कारण देवी के इस स्वरूप को चंद्रघंटा कहा जाता है। माता का वाहन सिंह है और उनकी दस भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र तथा पूजन से जुड़ी वस्तुएं दर्शाई जाती हैं। उनका यह स्वरूप भक्तों को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
नवरात्रि के तीसरे दिन भक्त सुबह स्नान करके मां चंद्रघंटा की पूजा करते हैं, फूल अर्पित करते हैं और देवी के मंत्रों का जाप करते हैं। इस दिन माता की व्रत कथा पढ़ने और सुनने की भी परंपरा है। आइए जानते हैं मां चंद्रघंटा की कथा, पूजा विधि और ध्यान मंत्र।
मां चंद्रघंटा की व्रत कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में महिषासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर था। अपनी शक्ति और सामर्थ्य के घमंड में उसने देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया। उसका अत्याचार लगातार बढ़ता गया और उसने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। महिषासुर के आतंक से देवता भयभीत हो गए। तीनों लोकों में अशांति फैलने लगी और धर्म की रक्षा करना कठिन हो गया।
महिषासुर के अत्याचारों से परेशान होकर सभी देवता एकत्रित हुए और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश के पास पहुंचे। उन्होंने देवताओं के सामने अपनी पीड़ा रखी और असुर के आतंक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। देवताओं की व्यथा सुनकर त्रिदेव क्रोधित हो उठे। उनकी दिव्य शक्तियों के तेज से एक अद्भुत देवी का प्राकट्य हुआ। यही देवी आगे चलकर मां दुर्गा के नाम से विख्यात हुईं।
देवी को महिषासुर से युद्ध करने के लिए सभी देवताओं ने अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। भगवान शिव ने त्रिशूल, भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र और इंद्रदेव ने घंटा दिया। अन्य देवताओं ने भी देवी को अपनी शक्तियां और दिव्य अस्त्र अर्पित किए। हिमालय ने उन्हें सिंह वाहन प्रदान किया।
सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न होकर देवी ने महिषासुर को युद्ध के लिए ललकारा। देवी के तेज और पराक्रम को देखकर असुरों की सेना भी विचलित हो उठी। इसके बाद देवी और असुरों के बीच भीषण युद्ध हुआ। अंततः मां दुर्गा ने महिषासुर का वध करके देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई।
धार्मिक परंपरा में मां चंद्रघंटा को देवी दुर्गा के उस शक्तिशाली स्वरूप के रूप में पूजा जाता है, जो भक्तों को भय से मुक्ति और साहस का संदेश देता है। महिषासुर के अंत के बाद देवताओं ने देवी की स्तुति की और तीनों लोकों में शांति तथा धर्म की पुनर्स्थापना हुई।
इस कथा से यह संदेश मिलता है कि अहंकार और अत्याचार चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः सत्य और धर्म की विजय होती है। मां चंद्रघंटा की आराधना इसी शक्ति, साहस और धर्मनिष्ठा का स्मरण कराती है।
मां चंद्रघंटा की पूजा विधि
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा श्रद्धा और स्वच्छता के साथ की जाती है। भक्त अपनी पारिवारिक परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार पूजा कर सकते हैं।
पूजा की विधि इस प्रकार है:
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करें।
- मां दुर्गा और मां चंद्रघंटा का ध्यान करके दीपक जलाएं।
- देवी को फूल, अक्षत, धूप, दीप और अपनी परंपरा के अनुसार फल या मिठाई अर्पित करें।
- मां चंद्रघंटा के मंत्र का जाप करें।
- माता की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- अंत में मां दुर्गा की आरती करके परिवार की सुख-शांति और खुशहाली के लिए प्रार्थना करें।
पूजा के दौरान मन को शांत रखें और अपनी श्रद्धा के अनुसार देवी का स्मरण करें। व्रत रखने वाले लोग अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार नियमों का पालन करें।
मां चंद्रघंटा का स्वरूप और महत्व
मां चंद्रघंटा को मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप माना जाता है। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र होता है। उनका सिंह वाहन शक्ति और निर्भयता का प्रतीक है। देवी के हाथों में अस्त्र-शस्त्र होने के साथ आशीर्वाद देने वाली मुद्रा भी दिखाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की पूजा से भक्तों को साहस, आत्मविश्वास और मानसिक शांति की प्रेरणा मिलती है। देवी का यह स्वरूप बताता है कि शक्ति का उपयोग धर्म की रक्षा और अन्याय का सामना करने के लिए किया जाना चाहिए। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का ध्यान करते हुए भक्त अपने जीवन में धैर्य, सकारात्मकता और विवेक बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।
मां चंद्रघंटा का ध्यान मंत्र
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना के दौरान इस प्रचलित ध्यान मंत्र का पाठ किया जाता है:
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम्॥
मंत्र का जाप श्रद्धा और एकाग्रता के साथ करें। यदि आप विस्तृत ध्यान मंत्र का पाठ करना चाहते हैं, तो किसी विश्वसनीय धार्मिक ग्रंथ या प्रामाणिक पूजा-पुस्तिका में उपलब्ध पाठ का अनुसरण करें।
मां चंद्रघंटा की पूजा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की आराधना भक्तों को भय और कठिनाइयों का सामना करने की प्रेरणा देती है। देवी का घंटा नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध सजगता और शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जबकि उनका शांत और करुणामय स्वरूप भक्तों को शांति तथा सद्भाव का संदेश देता है।
नवरात्रि में पूजा और मंत्र जाप का उद्देश्य केवल मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करना ही नहीं, बल्कि आत्मसंयम, श्रद्धा और सकारात्मक विचारों को भी बढ़ावा देना है। इन धार्मिक मान्यताओं को आस्था और परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए।






