धर्म संवाद / डेस्क: देशभर में आज गणेश चतुर्थी का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। घरों से लेकर बड़े-बड़े पूजा पंडालों तक भगवान गणेश की स्थापना कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जा रही है। इसी बीच राजस्थान की राजधानी जयपुर स्थित प्रसिद्ध मोती डूंगरी गणेश मंदिर में गणेश चतुर्थी से पहले निभाई जाने वाली सिंधारा यानी सिंजारा रस्म भक्तों के बीच खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
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इस विशेष परंपरा में भगवान गणेश को मेहंदी अर्पित की जाती है और बाद में इसे प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है। खासतौर पर बड़ी संख्या में अविवाहित युवक-युवतियां मंदिर पहुंचकर मेहंदी प्रसाद लेने के लिए कतार में नजर आए।
क्या है मोती डूंगरी गणेश मंदिर की सिंधारा परंपरा?
जयपुर के मोती डूंगरी गणेश मंदिर में गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले सिंधारा या सिंजारा की रस्म निभाने की पुरानी परंपरा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, जन्म या विवाह जैसे शुभ अवसरों पर नए वस्त्र और मेहंदी अर्पित करने की परंपरा रही है।
इसी परंपरा का संबंध गणेश चतुर्थी के अवसर पर मंदिर में होने वाली विशेष पूजा से भी माना जाता है। इस दिन भगवान गणेश को विशेष पोशाक पहनाई जाती है और उन्हें स्वर्ण मुकुट, नौलखा हार तथा चांदी के सिंहासन से सजाया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद भगवान को अर्पित की गई मेहंदी श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में दी जाती है।
मेहंदी प्रसाद को लेकर क्या है मान्यता?
मोती डूंगरी गणेश मंदिर की सिंधारा रस्म की मेहंदी को लेकर भक्तों में विशेष आस्था देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यता है कि विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने की कामना से अविवाहित युवक-युवतियां यहां की मेहंदी अपने हाथों पर लगाते हैं।
मान्यता के अनुसार, जो लोग विवाह की इच्छा रखते हैं या जिनके विवाह में लंबे समय से किसी कारण से बाधा आ रही है, वे इस मेहंदी को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। कुछ श्रद्धालुओं की आस्था है कि मेहंदी लगाने के बाद उनकी विवाह संबंधी मनोकामना पूरी हो सकती है। हालांकि, ये धार्मिक आस्थाएं और परंपराएं हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। भक्त इन्हें अपनी श्रद्धा और विश्वास के आधार पर मानते हैं।
राजस्थान के अलावा दूसरे राज्यों से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु
सिंधारा की इस विशेष रस्म में सिर्फ जयपुर और राजस्थान के लोग ही शामिल नहीं होते। हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु दूसरे राज्यों से भी मोती डूंगरी गणेश मंदिर पहुंचते हैं।
बताया जाता है कि हरियाणा, गुजरात और पंजाब सहित कई राज्यों से अविवाहित युवक-युवतियां मेहंदी प्रसाद लेने के लिए यहां पहुंचते हैं। गणेश चतुर्थी के आसपास मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ काफी बढ़ जाती है। यही वजह है कि सिंधारा रस्म अब जयपुर के गणेश चतुर्थी उत्सव की प्रमुख परंपराओं में शामिल हो चुकी है।
इस बार 3500 किलो मेहंदी की व्यवस्था
मंदिर के पुजारी के अनुसार, इस बार सिंधारा रस्म के लिए करीब 3500 किलो मेहंदी मंगाई गई है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को देखते हुए मेहंदी वितरण के लिए मंदिर परिसर में 8 स्थानों पर व्यवस्था की गई है। मंदिर प्रबंधन की कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा भक्तों को मेहंदी प्रसाद मिल सके और कोई भी श्रद्धालु खाली हाथ वापस न लौटे।
मेहंदी लेने के लिए सुबह से ही मंदिर के बाहर और आसपास श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। इस दौरान भक्त भगवान गणेश के दर्शन के साथ मेहंदी प्रसाद प्राप्त करने के लिए उत्साहित नजर आए।
गणेश चतुर्थी से शुरू होता है गणेश उत्सव
हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी को भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन घरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है।
कई स्थानों पर कई दिनों तक गणेशजी की पूजा, आरती और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। गणेश उत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश प्रतिमा के विसर्जन के साथ होता है।
भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक, शुभता और विघ्नों को दूर करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है। इसलिए गणेश चतुर्थी के अवसर पर श्रद्धालु सुख-शांति, समृद्धि और जीवन में आने वाली बाधाओं से मुक्ति की कामना करते हैं।
करीब 500 साल पुराना माना जाता है मोती डूंगरी गणेश मंदिर का इतिहास
जयपुर का मोती डूंगरी गणेश मंदिर राजस्थान के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। मंदिर के इतिहास को लेकर कई धार्मिक और स्थानीय मान्यताएं प्रचलित हैं और इसे करीब 500 साल पुराना बताया जाता है।
मान्यता है कि मंदिर में स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा राजस्थान के मावली क्षेत्र से जयपुर लाई गई थी। कहा जाता है कि प्रतिमा को बैलगाड़ी से जयपुर लाया जा रहा था। रास्ते में जिस स्थान पर बैलगाड़ी रुक गई, उसी स्थान को भगवान गणेश की स्थापना के लिए शुभ माना गया।
इसके बाद मोती डूंगरी की पहाड़ी के नीचे मंदिर का निर्माण कराया गया। वर्तमान मंदिर के निर्माण को 18वीं शताब्दी से जोड़ा जाता है और इसके निर्माण में सेठ जय राम पालीवाल की भूमिका का उल्लेख स्थानीय इतिहास में मिलता है। समय के साथ यह मंदिर जयपुर के प्रमुख आस्था केंद्रों में शामिल हो गया। यहां होने वाले विशेष धार्मिक आयोजन, गणेश चतुर्थी की भव्यता और श्रद्धालुओं की गहरी आस्था इसे राजस्थान के प्रसिद्ध गणेश मंदिरों में खास स्थान दिलाती है।
गणेश चतुर्थी पर क्यों खास है मोती डूंगरी मंदिर?
गणेश चतुर्थी के दौरान मोती डूंगरी मंदिर में विशेष सजावट और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। सिंधारा की मेहंदी रस्म इस आयोजन की खास पहचान बन चुकी है।
एक तरफ जहां भगवान गणेश को विशेष श्रृंगार से सजाया जाता है, वहीं दूसरी ओर मेहंदी प्रसाद पाने के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं। खासकर विवाह योग्य युवक-युवतियों के बीच इस परंपरा को लेकर विशेष उत्साह दिखाई देता है।
यही वजह है कि हर साल गणेश चतुर्थी के आसपास जयपुर का मोती डूंगरी गणेश मंदिर श्रद्धा, परंपरा और उत्सव का बड़ा केंद्र बन जाता है।






