धर्म संवाद / डेस्क : सनातन धर्म में भगवान हनुमान को संकटमोचन, अटूट भक्ति, साहस और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा करने से जीवन के कई संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यही कारण है कि हर मंगलवार और शनिवार को लाखों श्रद्धालु हनुमान मंदिरों में दर्शन कर उन्हें सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान हनुमान को विशेष रूप से चमेली का तेल ही क्यों चढ़ाया जाता है? आइए जानते हैं इसके पीछे की धार्मिक मान्यता और इसका महत्व।
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भगवान हनुमान को चमेली का तेल क्यों चढ़ाया जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान हनुमान को सिंदूर और चमेली का तेल अत्यंत प्रिय है। हनुमान जी की पूजा में इन दोनों का विशेष स्थान माना जाता है। कई मंदिरों में भक्त सिंदूर के साथ चमेली का तेल अर्पित करते हैं, जिसे पारंपरिक पूजा विधि का हिस्सा माना जाता है।
सिंदूर और हनुमान जी से जुड़ी धार्मिक कथा
प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार भगवान हनुमान ने माता सीता को अपनी मांग में सिंदूर लगाते हुए देखा। जब उन्होंने इसका कारण पूछा, तो माता सीता ने बताया कि यह भगवान श्रीराम की लंबी आयु और मंगलकामना के लिए लगाया जाता है।
श्रीराम के प्रति अपनी अपार भक्ति और समर्पण के कारण हनुमान जी ने यह सोचकर अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया कि यदि थोड़े से सिंदूर से प्रभु की आयु बढ़ सकती है, तो पूरे शरीर पर सिंदूर लगाने से उन्हें और अधिक लाभ मिलेगा। तभी से हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।
चमेली के तेल का धार्मिक महत्व
धार्मिक परंपराओं में चमेली के तेल को पवित्रता, सुगंध और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। हनुमान जी की प्रतिमा पर सिंदूर के साथ चमेली का तेल लगाने से सिंदूर आसानी से अर्पित किया जा सकता है। कई मंदिरों में यह पूजा की पारंपरिक विधि का हिस्सा है। हालांकि, पूजा-पद्धति अलग-अलग क्षेत्रों, मंदिरों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार भिन्न हो सकती है।
किस दिन चढ़ाया जाता है चमेली का तेल?
अधिकांश श्रद्धालु मंगलवार और शनिवार को भगवान हनुमान को चमेली का तेल और सिंदूर अर्पित करते हैं। इन दिनों भक्त हनुमान चालीसा, सुंदरकांड और बजरंग बाण का पाठ भी करते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा से भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त होती है।
पूजा के समय रखें इन बातों का ध्यान
- पूजा हमेशा स्वच्छ मन और सच्ची श्रद्धा के साथ करें।
- मंदिर या परिवार की परंपरा के अनुसार ही पूजा सामग्री अर्पित करें।
- यदि किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान या पूजन का आयोजन कर रहे हैं, तो योग्य पुजारी से मार्गदर्शन लेना उचित माना जाता है।
- पूजा का मूल उद्देश्य श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक भाव होना चाहिए।






