धर्म संवाद / डेस्क : विश्व प्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और रहस्यमयी नीतियों के लिए जाना जाता है। इन्हीं में से एक है दयाना सेवा या दयाना अर्पण, जो केवल पुरी के श्रीमंदिर में ही की जाती है। दयाना के सुगंधित पत्तों का यह विशेष अर्पण भारत के किसी अन्य मंदिर या पूजा स्थल में नहीं होता, जिससे इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
कैसे शुरू हुई दयाना अर्पण की परंपरा?
श्रीमंदिर की प्राचीन परंपरा के अनुसार यदि रात में किसी देवता की माला, वस्त्र या फूल गिर जाता था तो भिताराच्छ महापात्र सेवक सुबह की पूजा से पहले उसे पुनः स्थापित कर देते थे। लेकिन यदि भगवान जगन्नाथ के सिर से गबा (विशेष पुष्प आभूषण) गिर जाता, तो उसे तत्कालीन राजा को अर्पित करना अनिवार्य माना जाता था।
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किंवदंती के अनुसार एक रात भगवान जगन्नाथ के सिर से गबा गिर गया। सेवक उसे लेकर राजा के पास पहुंचे, लेकिन उस समय राजा पाशा खेलने में व्यस्त थे। उनका दाहिना हाथ व्यस्त देखकर सेवक ने गबा उनके बाएं हाथ में रख दिया।
पश्चाताप से जन्मा दयाना पौधा
भगवान की भेंट को बाएं हाथ से ग्रहण करने पर राजा को गहरा पश्चाताप हुआ। उन्होंने इसे प्रभु का अपमान मानते हुए अपने बाएं हाथ को कटवाने का निर्णय लिया। कथा के अनुसार कटे हुए हाथ को फूलों के बगीचे में दफना दिया गया।
अगले दिन उसी स्थान पर एक सुगंधित पौधा उग आया। यह पौधा दयाना कहलाया। उसकी मनमोहक सुगंध से प्रभावित होकर राजा ने उसे भगवान जगन्नाथ को अर्पित करने की इच्छा जताई, लेकिन उस समय पुरोहितों को इसके महत्व की जानकारी नहीं थी, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया गया।
भगवान ने स्वप्न में दिया आदेश
कुछ समय बाद मंदिर के सेवकों ने देखा कि भगवान जगन्नाथ स्वयं दयाना की पत्तियों से अलंकृत दिखाई दे रहे हैं और पूरा गर्भगृह उसकी सुगंध से महक रहा है। कथा के अनुसार उसी रात भगवान जगन्नाथ ने राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और बताया कि दयाना पौधा उन्होंने स्वयं उत्पन्न किया है। भगवान ने आदेश दिया कि दयाना के पत्तों को प्रतिदिन उनके भोग और श्रृंगार में शामिल किया जाए। तभी से दयाना सेवा श्रीमंदिर की महत्वपूर्ण परंपरा बन गई।
क्या है दयाना चोरी नीति?
हर वर्ष चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन श्रीजगन्नाथ बल्लभ उद्यान में दयाना चोरी नीति का आयोजन किया जाता है। इस विशेष रस्म में राधा-कृष्ण और भगवान कंदर्प की चित्रित प्रतिमाओं वाली पालकी सेवकों के साथ उद्यान तक जाती है।

वहां से छह दयाना पौधे मंदिर लाए जाते हैं। बड़ा सिंहार भोग के बाद तीन पौधे भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को अर्पित किए जाते हैं, जबकि शेष तीन पौधों को विशेष टोकरी में रखा जाता है। अगले दिन सकाल धूप के बाद इन पौधों को मंदिर परिसर में शोभायात्रा के रूप में घुमाया जाता है और फिर देवताओं को अर्पित किया जाता है।
दयाना पत्तों का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व
मान्यता है कि दयाना के पत्ते भगवान नारायण के प्रिय आभूषणों में से एक हैं। वहीं इसकी सुगंधित खुशबू कीड़ों और अन्य हानिकारक तत्वों को दूर रखने में भी सहायक होती है। यही कारण है कि पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर में भगवान की पवित्र दारु (लकड़ी) से निर्मित प्रतिमाओं की पूजा और संरक्षण में दयाना के पत्तों का विशेष उपयोग किया जाता है।
आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम
दयाना सेवा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रीजगन्नाथ संस्कृति की अनमोल विरासत है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी श्रद्धालुओं को भगवान जगन्नाथ की महिमा और श्रीमंदिर की विशिष्ट परंपराओं से जोड़ती है।






